Apr 29, 2019

वो फॅमिली स्ट्रेस से कैसे निपटे?





एक गाँव में एक टीचर रहता था.
अच्छा सेटल था,
लेकिन
ऱोज-ऱोज की फॅमिली स्ट्रेस से बेहद परेशान भी.

इस अशांति से फ्री होने का
एक ही रास्ता उसे नज़र आया
कि वो आत्महत्या कर ले.
किन्तु ये फ़ैसला इतना आसान भी नहीं था.

उसके परिवार का क्या फ्यूचर होगा,
अगर वो ऐसे चला जाए तो?
इस उलझन से वो कैसे निपटे?

समाधान की अंतिम इच्छा लिए
वो गाँव से कुछ ही दूरी पर स्थित
महर्षि रमण के आश्रम में जा पहुंचा.

उन्हें नमस्कार कर
आत्महत्या का कारण बता उनसे मार्गदर्शन माँगा.

उस समय महर्षि
आश्रमवासियों के भोजन के लिए
बड़ी सावधानी से पत्तलें तैयार कर रहे थे.
उन्होंने चुपचाप उसकी सारी बातें सुनी.

टीचर ने सोचा कि इतना बड़ा फ़ैसला है,
शायद
गुरूजी इसलिए ही लेट हो रहे हैं
और
कुछ भी बोल नहीं रहे हैं.

पत्तल बनाने में उनकी मेहनत,
लगन और फोकस देख कर
टीचर को बड़ा आश्चर्य हुआ.

उससे रहा ना गया.
उसने पूछा, "हे प्रभु,
आप इन पत्तलों को
इतनी मेहनत और लगन से बना रहे हैं,
लेकिन क्या आप नहीं जानते कि
कुछ देर बाद ही भोजन के उपरान्त
ये कूड़े में फेंक दी जायेंगी.

महर्षि मुस्कुरा कर बोले, आपने ठीक कहा.
लेकिन
किसी भी चीज़ का पूरा यूज़
हो जाने के बाद उसे फेंकना बुरा नहीं है.
बुरा तो तब है,
जब उसका यूज़ किये बगैर ही
किसी अच्छी अवस्था में ही कोई उसे फेंक दे.

आप तो ज्ञानवान हैं,
हज़ारों बच्चों को शिक्षित करते हैं,
आप ज़रूर मेरे कहने का मतलब
समझ ही गये होंगे.

ये सुनकर टीचर महोदय को जैसे
अपनी प्रॉब्लम का समाधान मिल गया.
उनमें फ़िर से जीने का जोश उमड़ पड़ा
और
उन्होंने आत्महत्या का विचार
हमेशा के लिए हवा में उड़ा दिया.

सभी सोर्स: इंटरनेट/गूगल


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