May 3, 2019

1-2 का 4 और 4-2 का 1.





ये सवाल पूछते ही लोग
कह सकते हैं कि
तुम शायद किसी बड़ी परेशानी में हो.

क्या आपने देखा है? 
ऐसा होता रहता है.

जब आप गलती से उनसे कुछ
ऐसा पूछ बैठते हैं
जैसे कि 
"यार, लाइफ एक्चुअल में है क्या?"

ये उनके सिर में दर्द करने जैसा है.
वो कहते हैं अभी बिजी रहो,
“एट द एंड ऑफ़ लाइफ” देखेंगे,
अभी तो कमाने के दिन हैं.
वो अपनी जगह बिलकुल सहीं हैं.

“एट द एंड ऑफ़ लाइफ”
बस देखा ही जा सकता है.
एग्जिट का समय जो है.

वैसे,
हर चीज़ का एक वक़्त होता ही है.

आने का था.
रहने का है 
और फ़िर 
जाने का भी होगा.

हाँ या ना?


और हाँ,
"लाइफ़" 
इतनी बुरी भी नहीं है,
जितनी अपने नाम से लगती है.
बड़ी लाइट है. सॉफ्ट भी. 

कभी-कभी पकाऊ भी.

पर तुम्हारी है.

ये 1 या 0 नहीं है.
इस रेंज के बीच की पहेली भर.
ये आना है (1),
हँसना है,
रोना है
गुनगुनाना है
और मिट्टी हो जाना है (0).

और,
जिसे तुम पाना समझ रहे हो,
वैसी कोई केस स्टडी नहीं होती.
लाइफ 1-2 का 4 और 4-2 का 1 है.


लाइफ का सीधा सा मतलब है कि
तुम ख़ुद को जान गए हो.

कुछ इस तरह से कि
ये एहसास हो चला हो कि  
इतने बड़े ब्रह्मांड में,
अरबों लोगों के डेटा-बेस में
तुम कितने छोटे, आज़ाद 
और 
यक़ीनन स्मार्ट भी हो.

स्मार्ट या दूसरों से बेहतर होना,
मतलब किसी के सामने
अपना इंटरव्यू देकर प्रूव करना  
और
लाइफ मतलब
ख़ुद ही ख़ुद का इंटरव्यू लेना.

इंटरव्यू कॉमन है,
बस प्लेसमेंट अलग है.

थोड़ा सोचना.

फ़िर ही तुम किसी धुन पर नाच सकोगे.


वरना उससे पहले तक,

जिंदगी सिर्फ़ एक लट्टू है,
घूमती रहेगी,

लेकिन पहुचेगी 

कहीं नहीं.

और ठहरी जिंदगी,

बदबू पैदा करती है.

तुम क्या चाहते हो?

इमेज सोर्स: गूगल




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