May 12, 2019

हल्का सा चेक तो कीजिए.






रसोईघर में एक-एक भिंडी को,
बड़े प्यार से धोते-पोंछते हुये काटा जा रहा था.
अचानक एक भिंडी के ऊपरी हिस्से में छेद दिख गया,
सोचा, भिंडी खराब हो गई,
फेंक दें.


लेकिन नहीं,
ऊपर से थोड़ा काटा,
कटे हुये हिस्से को फेंक दिया.


फिर बची भिंडी को ध्यान से देखा,
शायद कुछ और हिस्सा खराब था,
थोड़ा और काटा और फेंक दिया.


फिर बारीकी से तसल्ली की,
बाक़ी भिंडी ठीक है भी के नहीं.


तसल्ली होने पर काट के,
सब्ज़ी बनाने के लिये रखी भिंडी में,
उसे मिला दिया गया.


वाह क्या बात है...!
50 पैसे की एक भिंडी को भी,
हम कितने ख्याल से,
कितने ध्यान से सुधारते हैं.
प्यार से काटते हैं,
जितना हिस्सा सड़ा है,
उतना ही काट के अलग करते हैं,
बाक़ी अच्छे हिस्से को स्वीकार कर लेते हैं.
कितना क़ाबिले तारीफ प्रोसेस है.


लेकिन अफसोस !
भिंडी से इतर,
जीते-जागते इंसानों के लिये हम,
कितने कठोर हो जाते हैं,
एक ग़लती दिखी नहीं कि
उसके व्यक्तित्व की
पूरी गरिमा को ही काट के फेंक देते हैं.
उसके बरसों के अच्छे कामों को,
पल भर में दरकिनार कर देते हैं.



महज कुछ क्षणों की,
अपनी ईगो को संतुष्ट करने के लिए
उससे नाता तक तोड़ देते हैं.


और फ़िर
माइंड को रीसायकल कराते रहते हैं
कि
सबकुछ ख़राब है.



पहले ख़ुद को भी 
हल्का सा चेक तो कीजिए,
क्या पता वो इंसान,
भिंडी के मुकाबले थोड़ा ठीक ही हो.



भिंडी की सब्जी तो आखिर बन ही जाएगी.
ना फ़िर वो भिंडी मिलने वाली
और
ना ही वो इंसान.




चलते-चलते:
टिंडे भी कुछ सस्ते हो गए हैं.
लाना मत भूलना.


थैंक यू: ललित बाबू

इमेज सोर्स: गूगल

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