May 18, 2019

थोड़ा शुद्ध बनिए. हल्के-हल्के बुद्ध बनिए. हैप्पी बुद्ध पूर्णिमा.







प्रिंस सिद्धार्थ एक दिन घूमने के लिए बाहर निकले
सिक्यूरिटी टाइट थी,
क्योंकि 
उनके राजा पिता नहीं चाहते थे
कि
वो कुछ ऐसा देखें जिससे
जीवन की परतें खुलने लगे
और
राजकुमार बेचैन हो उठें.

लेकिन होनी से कौन बचा है आज तक?


सिद्धार्थ को कुछ लोग
एक आदमी को उठाकर ले जाते दिखाई दे गए.
डोरियों से बंधा, सफ़ेद कपड़े में लिपटा हुआ मृत शरीर
रिश्तेदार जोर-जोर से रोये जाएँ
और
पत्नी, मां और बहनों का तो और भी बुरा हाल.


राजकुमार ने अपने साथ आये ड्यूटी ऑफिसर  
से इस रोने-पीटने का कारण पूछा?
उसने बताया कि सफ़ेद कपड़ों वाला ये आदमी मर चुका है  और
रोने वाले इसके रिलेटिव हैं.
इसे श्मशान में जलाने के लिए ले जाया जा रहा है.


प्रिंस ने सब सुना और उदास हो गए.
बोले- यह मर क्यों गया है?

ड्यूटी ऑफिसर ने कहा
एक ‍न एक दिन सभी को मरना है.
मौत से आज तक कौन बचा है.


सिद्धार्थ ने ऑफिसर को तुरंत वापस
महल में चलने को कहा.

राजा ने देखा कि
आज प्रिंस इतनी जल्दी लौट आए?

उन्होंने ड्यूटी ऑफिसर को बुलाया
उसने सारी बात बता दी.
प्रिंस की सिक्यूरिटी और टाइट कर दी गयी.

कुछ दिनों बाद ऐसे ही घूमते हुए सिद्धार्थ ने
एक संन्यासी को देखा
तेजस्वी चेहरा, आनंद भाव से भरपूर.
ड्यूटी ऑफिसर से पूछने पर पता चला कि
ये एक संन्यासी है
और
सबसे नाता तोड़कर
इसने भगवान से अपना नाता जोड़ लिया है.


अब प्रिंस चिंतन में कि
बुढ़ापा, बीमारी और मौत इन सबसे छुटकारा कैसे हो?
दुखों से कैसे बच निकला जाये?
मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मैं भी उस तेजस्वी संन्यासी की तरह बन जाऊ?


इन्हीं दिनों में सिद्धार्थ की पत्नी
यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया.
दान-पुण्य किया गया
बच्चे का नाम रखा – राहुल.

दिन बीतते गए...

एक रात सिद्धार्थ चुपचाप अपने एक
विश्वासपात्र के साथ घोड़े पर सवार होकर 
महल से फ़रार.

पुत्र को देखने की इच्छा थी,  
लेकिन सब जाग जायेंगे,
ऐसा जानकर किसी से बिना मिले ही अलविदा
ज्ञान प्राप्ति के बाद वापिस लौटने का संकल्प लिए रवानगी.

कुछ दिनों बाद
युवा संन्यासी के रूप में किसी दूसरे राज्य में गुजर-बसर.

लोगों का मिलना-बिछड़ना.

कठिन तपस्या
सुंदर शरीर का काला पड़ जाना
कुछ खाना, ना पीना
बेहद कमज़ोर शरीर हो जाना

फ़िर किसी के समझाने पर कुछ खाना,
और शरीर में एनर्जी का आना,
तब ये जानना कि ख़ाली पेट भक्ति
का कोई मीनिंग नहीं है.

उसके बाद 6 साल तक तपस्या का चलना
सच्चे ज्ञान को उपलब्ध हो जाना
सारी इच्छाओं का गायब हो जाना
सिद्धार्थ से 'बुद्ध' कहलाना.
बुद्ध मीन्स जिसे बोध यानि ज्ञान हो जाए.

अब लोगों की परेशानियों को
अपने ज्ञान द्वारा दूर करना
और ज्ञान बाटना.

अपने संकल्प के मुताबिक घर लौटना

और
जब बुद्ध लौटे
तो पत्नी ने उत्साह के साथ स्वागत किया,
लेकिन,
साथ ही पूछ भी लिया
कि क्या ये ज्ञान आपको घर बैठे भी मिल सकता था?
बुद्ध का उत्तर “हां” में था.

कहते हैं कि
इतने सालों तक अपने परिवार से दूर रहने के लिए
उनके मन में दया-भाव आया,
और
उन्होंने खुले दिल से क्षमा मांगी
उनकी नज़र में ये भी
एक तरह की हिंसा की केटेगरी थी.


आज उन्हीं प्रिंस सिद्धार्थ की जयंती है
यानि निर्वाण दिवस
जिसे सब
“बुद्ध पूर्णिमा” के नाम से मनाते हैं.

आप सभी को भी मुबारक हो.


थोड़ा शुद्ध बनिए.
हल्के-हल्के बुद्ध बनिए.


                 सोर्स : इंटरनेट
           इमेज सोर्स: गूगल
                 

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