May 24, 2019

आपका दिमाग कोई डस्टबिन नहीं है. ये पॉवर हाउस है.





आजकल नो थिंकिंग बनाम ओवर-थिंकिंग पर 
ढ़ेरों डिबेट्स चल रही हैं
लेकिन ये कौन decide करेगा कि
आप सोचते नहीं या कम सोचते हैं 
या फ़िर ज्यादा सोचते हैं? और कैसे?


अगर आप सचमुच जिंदा ही हैं
तो सोचना रुक कैसे सकता है?
सोचना आदमी के जीवित होने का सबूत है.
किसी मुर्दे को आपने कब सोचते देखा?
इसीलिए सोचने को बुराई के रूप में देखना बंद कीजिए.


अगर आपके पास थिंकिंग पावर ही नहीं होगी तो
जिंदगी की ABCD का मज़ा कहाँ से उठा सकेंगे?


क्या आजकल ट्रेंड में चल रहा शब्द 
"ओवर- थिंकिंग" सच में हानिकारक है?
शायद ! शायद क्यों, बिलकुल भी नहीं.


आप को जानकर खुशनुमा लगेगा कि
आप जो सोचते हैं वह आपके लिए डेंजरस नहीं है बल्कि
ये आपके कंप्यूटर यानि दिमाग के 
स्पेयर-पार्ट्स को सही रखने में हेल्प करता हैं
और आपको दूरगामी फ़ैसले लेने में 
कम से कम टाइम लेता है.
आप नार्मल से कुछ आगे का देख पाते हैं
जो दूसरे शायद 10-20 साल बाद या शायद देख ही ना पाते हों.


और इससे
नए रास्ते खुलते हैं
सोच बदलती है
इतिहास बनते हैं
रिसर्च होती है
प्रोब्लेम्स के समाधान पर फोकस होने लगता है
समस्याओं का रोना बंद हो जाता है
ख़ुद को बेकार समझना कम हो जाता है
आप दूसरों के नज़रिए को समझ पाते हैं
और अंतत रिजल्ट्स अच्छे आते हैं.



फिर ऐसा क्या हैं सोचने में जो नुकसानदेह होता है? 


प्रोब्लेम्स के बारें में ही सोचते रहना नुकसानदेह है.
समाधान पर फोकस करना शुरू कीजिये.

ख़ुद को हर चीज़ के लिए दोषी मानते रहना ही नुकसानदेह है.
100% कुछ नहीं होता, इसे पक्का कर लीजिये.

दूसरों की थिंकिंग में खुद को ढालने की असंभव कोशिश करते रहना ही नुकसानदेह है.
आप यूनिक हैं, सब यूनिक हैं. इस बात को रेफ़र करना सीखिए.


आपका दिमाग कोई डस्टबिन नहीं है
ये पॉवर हाउस है
इसमें वो ही डालने की कोशिश करें, जो ज़रूरी है.


ये सब इतना इम्पोर्टेन्ट नहीं है कि
क्यों हुआ,
कैसे हुआ,
किसने क्या कहा?  
क्यों कहा? .आदि-आदि


इम्पोर्टेन्ट हैं 
आपकी लाइफ़ की खुशियाँ, संतुष्टि और ब्लेससिंग्स.
इन्हें काउंट करना शुरू कीजिए
और लाइफ़ अच्छा रिएक्शन ज़रूर देगी.
आज नहीं तो कल.


और ये कदाचित
ओवर-थिंकिंग नहीं होगी
बल्कि
ये ही थिंकिंग का सही तरीका होगा
जिससे आप अब तक अनजान थे
बस इतनी सी बात है.


इमेज सोर्स: गूगल

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