Jun 17, 2019

पिसा-पिसाया आटा, पिसी-पिसाई सेहत विद लेटेस्ट एप एंड अपडेट.





ऐसा बताया जाता है कि
पुराने टाइम में टेक्नोलॉजी का “टी” भी नहीं था.


कम पढ़े लिखे लोग
खान-पान भी सिंपल ही.
नॉलेज से ज्यादा व्यवहार पर बारगेनिंग.


बड़ी-बड़ी घरेलू चक्कियों पर ही आटा 
पीस लिया जाता था,
मसाले भी घर पर ही बारीक़ कर लिए जाते थे.
लोग बैलगाड़ियों से ही कई हज़ार किलोमीटर 
तक घूम आते थे.


धूप हों या छाँव,
परेशानी हो या कोई अच्छी ख़बर,
लोग अपने लोगों के बीच रह कर 
एडजस्ट कर लेते थे,
ख़ुश भी रह लेते थे 
क्योंकि लाइफ़ को गिविंग तरीके से,
ज़िम्मेदारी के भाव से देखा गया.


ये भी देखिये कि
उस समय के लोग सचमुच उतने 
अवेयर भी नहीं कहे जा सकते,
जितने की आज दिखाई दे रहे हैं  
और
जो उस वक़्त थे भी शायद 
उनकी % ना के बराबर ही रही होगी.


गुलामी पीरियड के दौरान रॉयल माने गए
कुछ ही लोग जागरूक समझे गए,
उन्हें ही विदेश घूमने के कुछ अवसर मिल सकें होंगे,
वो भी किन्ही मजबूर शर्तों पर.


और
उन्हें चलते-फिरते कोई भी सलाम ठोक देता तो 
वो ख़ुश भी फ़ील कर लेते थे.


हाँ, अपने-अपने तरीके से अपने रुतबे, 
अपनी अकड़ का प्रदर्शन करना
उस समय एक आर्ट रहा होगा.


आमतौर पर शेखी बघारना,
गुलामी से भी बहुत पहले पनपी एक आदत होती है.
वो बात अलग है कि 
ग्लोबल लेवल पर इसका कोई वजूद नहीं हुआ करता.


फ़िर भी
कुल मिलाकर
आप किसी भी जीवन-काल को अधूरा नहीं मान सकते.


सुना है कि किसी भी सुख-दुःख में 
वे लोग बेहद एक्टिव पार्टिसिपेशन करते थे,
थोड़ी कानाफूसी तो इतिहास में चलती ही आई है
बावजूद उसके 
लोग हल्के से कोशिशें कर ही लेते थे कि
किसी ना किसी तरीके से किसी के काम आ सकें.


उस समय भी दागी करैक्टर रहे होंगे
लेकिन ठीक-ठाक लोगों की मेजोरिटी से चीज़ें बैलेंस होती रही होंगी.


सुना है कि
उस समय हेल्थ टनाटन हुआ करती,
लोगों की उम्र भी टनाटन
बीमारी कैसी भी हो,
इलाज़ का देसी ट्रीटमेंट टनाटन,
जीवन सस्ता और दर्द रहित हुआ करता.


उन्हें क्या ये भी नहीं पता होगा कि
तनाव या स्ट्रेस किस चिड़िया का नाम है?
अगर ऐसा था तो
ऐसा अज्ञानी होना भी कमाल ही रहा होगा.


अब
आज में चलते हैं,
इन दिनों अंग्रेज सिर्फ़ घूमने आते हैं,
कोई गुलामी जैसा माहौल नहीं
शानदार घर,
शानदार नौकरियां,
जमीन-जायदाद,
बड़ी-बड़ी गाड़ियां,
पिसा-पिसाया आटा,
पिसे-पिसाये मसाले,
धुले-धुलाये कपड़े,
मिक्सी,
बेस्ट टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स,
बेस्ट अपडेटेड जनरेशन,
घर बैठे पेमेंट आप्शन,
घर बैठे आने-जाने की बुकिंग,
घर बैठे खाना आर्डर,
घर बैठे पैसे कमाएं ऑफर्स,
हर चीज़ की इंस्टेंट जानकारी


सब कुछ इतना आसान
आज से पहले शायद ही कभी रहा हो? 
मगर 
लोगों को फिर भी शिकायत है कि
अब किसी के पास टाइम नहीं है
ये कंट्राडिक्शन कैसे आ गया?


आपका कितना समय सेव किया टेक्नोलॉजी ने
और अब आप कहते हैं कि “आई ऍम टू बिजी”.


अब आप ऐसा क्या करने लग गए अचानक?


अब जब घर के काम में लोग कम बिजी हुए
तो हॉस्पिटल में ज्यादा काम आने लगा
डॉक्टर्स बिजी हो गए

और देखिये तो सही,

धीरे-धीरे
स्पिरिचुअल लीडर्स बिजी,
एडवोकेट्स बिजी,
ह्यूमन रिलेशन बिजी,
किड्स-मोबाइल में बिजी,
बाजार बिजी,
त्यौहार बिजी,
व्यवहार बिजी,
किरदार बिजी,

कोचिंग वाले तक बिजी. 



और 

फ़िर भी लाइफ़ उदास 

और 

मायूसी से लबालब.



ये भी कमाल ही हुआ,
टेक्नोलॉजी से हमें शांत होना चाहिए था,
हो गया एकदम उल्टा.
हम अब ज्यादा अशांत हो गए
और चुपके से “बिजी” भी.


एक्चुअली,
ये समय की साइकिल है,
जो अपने तरीके से चलती है
और
आदमी पैडल मारता रह जाता है.


आज लाइफ़ में ऐसे ऐसे एप 
और प्रोडक्ट्स आ गए हैं
कि 
अब “घर बैठे फैसिलिटी” ने मोबाइल को ही
हमनें अपना पूर्वज डिक्लेअर कर डाला है.


आज कौन सा गैजेट है आपके हाथ में?
क्या फीचर हैं इसके?

आप ख़ुश तो हैं ना.


आना कभी घर,
खेत-खेत घूमेंगे कभी.
नंगे-नंगे पाँव.

फ़िर पूछेंगे आपसे
आख़िर क्यों हो जाता है तनाव?



चलते-चलते :


सचमुच 

कुछ चीज़ें पार्ट-टाइम के लिए होती हैं 

और 

हम उन्हें फुल-टाइम मानने की भूल करते रहते हैं.

एंड वाईस-वर्सा.


यादें ट्रेवल करती रहती हैं.


इमेज सोर्स: गूगल




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