Jun 29, 2019

सब चीज़ों के पीछे एक ही परछाई है – प्रेशर






कई बार ऐसा होता ही है कि
हम कोई भी काम बड़े जोश के साथ स्टार्ट करते हैं
और कुछ समय बाद ही
हमारे तोते उड़ने लगते हैं.
तोते बेचारे भी क्या करें?
बिना उड़े उन्हें नेचुरल फील नहीं हो पाता.

अपनी जगह वो भी सहीं हैं
लेकिन
हमारे लिए वापिस ट्रैक पर आ पाना लम्बा होता जाता है.
फ़िर जीवन हमें बब्बल-गम की तरह स्ट्रेच करता है.

सब चीज़ों के पीछे एक ही परछाई है – प्रेशर


सचमुच
कितने प्रेशर में जीता है आदमी.
बचपन से
घर का प्रेशर,
सामाजिक प्रेशर,
कम्पटीशन का प्रेशर,  
ख़ुद को सफ़ल बनाने का प्रेशर
और उस सफ़लता को बनाए रखने का प्रेशर.

फ़िर ज़िम्मेदारी वाला घरेलू प्रेशर,
हेल्थ एंड प्लानिंग प्रेशर.
मरते दम तक प्रेशर ही प्रेशर.
रेगुलर में ब्लड प्रेशर.


कई बार लगता है कि
हर नाम के पीछे कास्ट कॉमन कर 
प्रेशर रख देनी चाहिए
जैसे
मिस्टर “A प्रेशर”
मिस “Y प्रेशर”.
सीनियर सिटीजन “श्री Z प्रेशर”
आदि-आदि.

चलो ये तो हँसाने के लिए था
मगर वैसे भी
आप देखते ही होंगे कि 
जंगल कम हैं, 
पहाड़ और नदियाँ भी सिकुड़ते चले गए
जानवरों के झुंड भी अब यदा-कदा 
किसी टूरिस्ट प्लेस पर
किसी हरियाली वाली जगह पर दिख जाए
तो बंदा उनके साथ सेल्फी लेकर
सोशल मीडिया पर ज़रूर बता देना चाहता है
कि वो कितना ख़ुश है?

लो जी,
ये ख़ुश दिखने का प्रेशर
शायद आज की डेट में सबसे बड़ा विचार बन कर उभरा है.

और अगर आप ख़ुशी के इस मुकाम से चूक गए
तो आउटडेटिड मान लिए जाओगे
यानि आउटडेटिड हो जाने का प्रेशर भी फ्री.

कितनी मज़ेदार स्कीम है ये रहने की.

बचपन में तो बताया गया कि
इंसान जन्म सबसे बेस्ट है.
कड़ी तपस्या के बाद मिलता है.

लेकिन ये किसी ने नहीं बताया कि
तपस्या प्रेशर के रूप में कंटिन्यू चलती रहेगी
जब तक कि आप की “टें” ना बोल जाए.

तो वापिस उसी बात पर लौटते हैं
कि
समय के साथ जोश आख़िरकार क्यों 
गिरगिट की तरह रंग बदलने लगता है?

साहब जी,

अब आप ही बताइए
इतने सारे प्रेशर के बीच में
क्या जिंदा रह पाना ही सबसे बड़ा जोश नहीं है?

क्या आप “ना” कह सकेंगे?

प्लीज,
प्रेशर अब कम लीजिए.

घर जाइए और चाय पीजिए.

प्रेशर से अलग भी कुछ कीजिए.
प्रेशर को ही प्रेस कर दीजिए.

वरना वैसे भी अभी किस्मत की मंदी का दौर है.

हंसिये, मुस्कुराइए या रो-धो के काम चलाइए,

सिलेक्शन आपका ही है जी.




(केवल एक हास्य-रचना)

इमेज सोर्स: गूगल






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