Jun 17, 2019

इधर हम इंजिनियर बने फ़िरते हैं.





लगभग 9 साल बाद आज मुझे उनसे 
मिलने का मौका मिला.


मुझे उनका चेहरा तो अच्छे से याद था,
बस नाम भूल गया था
और
ये मैंने उनसे डायरेक्ट पूछ भी लिया.
वो मिस्टर रविंदर निकले.


कभी हमारे साथ ही कॉलेज में काम किया करते थे.
क्लास और केटेगरी को छोड़ दिया जाए तो
जहाँ तक मेरी मेमोरी में हैं
हम कह सकते हैं कि
उनका काम 5-10 लोगों के छोटे समूह की एक्टिविटी पर ध्यान रखना होता था
और उसकी रिपोर्टिंग वो अपने हेड को देते रहे होंगे.


हमारे डिपार्टमेंट से तो मगर बिलकुल भी नहीं थे.

मिले तो उन्होंने बताया कि
आजकल पार्टनरशिप में एक स्कूल चलाते हैं.
स्कूल अच्छा चलता है.


वो ख़ुश हैं.
3 बच्चों में से 1 की शादी भी निपटा दी है
2 अभी पढ़ रहे हैं,
ऐसा उन्होंने बातचीत के दरमियाँ बताया.
पूरे समय एक पल के लिए भी
उनके चेहरे से हंसी गायब होती नहीं दिखी.


वैसे सालों पहले भी वो ऐसे ही मुस्कुराकर ही मिला करते
और आज भी सेम टू सेम.


ऐसे लोगों से मिल पाना सचमुच कितना ग्रेटफुल लगता है?
ये मुझे हमेशा फ़ील कराता है कि किसी की एनर्जी,
किसी की स्माइल 
कभी किसी पोस्ट, मुकाम या हैसियत की मोहताज़ नहीं होती.


इधर हम इंजिनियर बने फ़िरते हैं,
सीनियर हुए घूमते हैं,
अपने सर पर चिंताओं और उम्मीदों का बोझ लेकर,
ब्रह्मसरोवर पर डुबकी लगाकर हल्का हो जाना चाहते हैं.
इज्ज़त के तराजू पर दिन – रात तुलते रहते हैं.


फ़िर भी कई चीज़ों को बैलेंस करने के लिए हमें कितना
दिमाग खर्च करना पड़ता है.


और 
एक ये भाईसाहब निकले
बिलकुल बेपरवाह, रिलैक्स्ड,
जैसे सबकुछ इनके लिए किसी ने बनाकर दे दिया हो.
और 
चिंता करने के लिए उनके पास 
कोई टॉपिक भी नहीं था.


मुझे ज्यादा हैरानी ये देखकर भी हुई कि
उनके चेहरे पर इतने सालों बाद भी वो ही चमक थी.
कोई बुढ़ापा नहीं झलक रहा था.
वैसे का वैसा आदमी.
कोई प्लस या कोई माइनस नहीं.
और मिलने का तरीका भी इतना प्यारा
जैसे कोई अपना वर्षों बाद उनसे मिला हो.



सचमुच जब आप ऐसे लोगों से मिलते हैं
तो लाइफ़ का चार्म दोबारा लौट आता है.


आप कभी चेहरे याद करें तो
ध्यान देना
कि कम समझदार, 
कम उलझाने वाले,
आपके भाव और स्वभाव को एक्सेप्ट करने वाले,
समय पर काम आ जाने वाले,  
सीधे-साधे लोग आपके दिल के सबसे अच्छे कोने में
कहीं ना कहीं 
अपनी जगह परमानेंट कर लेते ही हैं.


वहीँ दूसरी तरफ़
ज्यादा कामयाब, 
ज्यादा समझदार दिखाई देने वाले लोग
उलझा तो सकते हैं मगर रास्ता मुश्किल ही देते हैं.
शायद ही कभी आप अपने जरुरी भावुक पलों में 
उन्हें अपने साथ खड़ा पाएं?
उन्हें आप ऑनलाइन सहानुभूति एक्सपर्ट कह सकते हैं.
और जरुरत के टाइम मिस्टर इंडिया की तरह 
वो कहीं गायब हो जाते हैं.


वो बस तभी आपकी वैल्यू कर पाते हैं,
जब आप उनके सीनियर या बॉस बन जाओ,
उससे पहले तक उनकी ईगो तड़के वाली प्याज की तरह सिकती रहती है.


खैर
आज मिस्टर रविंदर से मिलकर बहुत अच्छा लगा.

कल देखते हैं, कौन मिलता है?  

       (आपबीती - जगबीती सीरीज का एक अंश)  
इमेज सोर्स: गूगल


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