Jun 9, 2019

"ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार". ये कविता भी रो पड़ी आखिर.






एक देश शानदार बनता हैं वहाँ के लोगों से
और
एक देश शर्मसार भी होता है वहीँ के लोगों से.


दुःख आसमान से कभी नहीं टपकता
और नैतिकता कभी भी किताबें रट कर सीखी नहीं जाती.


ठीक-ठाक चल रही लाइफ़ में अचानक जब कोई
मासूमियत चींखे मारने लगती है
तो इंसान होने की समझ पर थू करने का मन करता है.


एक स्त्री के गर्भ से जन्मा व्यक्ति,
स्त्री जाति के साथ ही खिलवाड़ करने पर उतारू हो उठे
तो ये सभी के लिए डूब मरने जैसा ही है.


ये इंसानियत को कलंकित कर देने जैसा है
और इसकी सज़ा इतनी सार्वजनिक 
और भयावह होनी ही चाहिए
कि ऐसा कुछ सोचने से पहले ही 
आदमी की रूह कॉप उठे.


गलत काम के लिए डरना
और सही काम के लिए चलना 
आदमी को सीखना ही चाहिए,
सबके लिए इंसानियत तभी जिंदा रह सकती है,

वरना इंसान मात्र एक कचरे का ढेर है,
जिसे रीसायकल करने की जरुरत हमेशा बनी रहेगी
और ऐसा देश विशाल होकर भी बौना ही रह जायेगा.


आप सही काम के लिए किसी को
कुछ देर बाद भी सम्मान दें तो
वो चल सकता है
सहनीय है,
लेकिन
किसी घोर अपराध के लिए किसी को 
समय पर न्याय ना मिले
तो ये समय के चक्र में एक 
बेतुकी समझदारी ही मानी जायेगी
क्योंकि इससे इंसानियत के प्रति 
लोगों का विश्वास डगमगा सकता है.


बड़ी हैरानी की बात है कि
जो देश आगे बढ़ने के हौंसले के साथ 
दुनिया में छा जाने की इच्छा रख रहा हो,  
वहां मासूम बच्चियों के साथ, 
महिलाओं के साथ दरिंदगी और बेशर्मी की 
इंतिहा होती रहे
तो ये समझने की जरुरत है कि
वहां के लोगों को मानवता और इंसानियत 
की शिक्षा की सही तालीम कभी दी ही नहीं गयी
वर्ना कोई जानवर भी ऐसी ओछी हरकत 
शायद ही कभी करता हो,
वो भी तब जब इंसानों के अलावा 
कहीं और लोकतंत्र और प्रजातंत्र का राग 
अलापा नहीं जाता.


और अगर लोग इतने ही नीचे गिर चुकें हैं तो
ऐसे देश में
सिस्टम को सीधा और पारदर्शी बनाने पर ध्यान देना
उस देश का पहला बुनियादी लक्ष्य
होना ही चाहिए.


सीधी सी बात ये है
कि जहाँ गलत करने के बाद डर लगना बंद हो जाए
और सिर्फ़ किताबी तरीकों से न्याय प्रक्रिया 
खिंची जा रही हो,
वहां अपराधियों के बच निकलने के चांस 
100 फ़ीसदी बढ़ ही जाते हैं
और 
भावनाएं अक्सर दम तोड़ती ही नज़र आती हैं.


अब या तो सब इसे भाग्य से जोड़कर 
चुपचाप बैठ जाएँ
या फ़िर
इंसानियत की कोई नयी ईबारत लिखें
जो इंसानों के लिए कारगर साबित हो.


ये सिर्फ़ शरीर की दरिंदगी से जुड़े सवाल नहीं हैं
बल्कि
मन में पल रहे गलत मंसूबों की बानगी है
जो कृत्यों के रूप में हाईलाइट हो ही जाती है.


जिस तरह एक बड़ी बीमारी का इलाज़ करने के लिए
तुरंत किसी बड़े ऑपरेशन की जरुरत होती है,
ठीक वैसे ही हैवानियत की इस बीमारी के 
परमानेंट इलाज़ की जरुरत है
वरना सभी को
“ट्विंकल-ट्विंकल लिटिल स्टार” 
जैसी कवितायेँ गुनगुनाने
से परहेज कर ही लेना चाहिए
और
मोमबत्ती जला-बुझा कांटेस्ट में भाग लेते रहना चाहिए.



इमेज सोर्स: गूगल




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