Jul 29, 2019

समय से परे हैं भोलेनाथ.





आज महा-शिवरात्रि है.
भगवान् शिव को लोग अलग – अलग तरीकों से पूजते हैं.

कांवड़ शिव मंदिरों में चढ़ाई जाती है.
शिवलिंग पर दूध और बेलपत्र चढ़ा कर शिव से मनोकामना पूरी करने की रिक्वेस्ट की जाती है.
महामृतुन्जय मंत्र के उच्चारण से वातावरण शिवमय हो उठता है.

शिव अनंत हैं.
उन्हें आदि योगी भी कहा गया है.
उनकी महिमा को शब्दों से बाँध कर बता पाना बेहद मुश्किल है.

वो समझने और महसूस करने के देवता हैं.
अत्यंत भोले, निर्भीक. देने वाले. 
वो समय से परे हैं और 
सारा अस्तित्व उनके लिए चुटकी भर से अधिक नहीं.

ध्यान के समय वो पूर्णतया ध्यानमग्न हैं.
नृत्य करते हुए वो सम्पूर्ण नृतक हैं.
तांडव करते हुए वो केवल तांडव ही करते हैं.
प्रार्थना सुनते समय वो पूरी तरह से प्रार्थना को सुनते हैं.
गुस्सा करते समय वो पूरी तरह गुस्सैल प्रतीत होते हैं
लेकिन वो सबकुछ उनका बाहरी प्रदर्शन मात्र है.

भीतर से वो बहुत भोले और हेल्पिंग हैं.
जो आपको असंभव भी लग रहा हो,
शिव उसे भी संभव करके 
आपको भावविभोर कर सकते हैं
बस आपका यकीन यक़ीनन ओरिजिनल होना चाहिए.

शिव यानि समय से भी पहले और समय के भी बाद.
ऑनलाइन भी और ऑफलाइन भी.
शिव की महिमा का प्रवाह पल-पल बह रहा है.
बस ख़ुद को उनकी कृपा का पात्र बनने की देर है
और फ़िर आप हर दिन शिवरात्रि की तरह सेलिब्रेट कर सकते हैं.
भगवान् शिव की फ्लेक्सिबिलिटी से हम 
जीवन के बड़प्पन को आसानी से देख सकते हैं.

हम सभी को शिव जी का आशीर्वाद मिलता रहे,
इसी कामना के साथ हैप्पी शिवरात्रि.

इमेज सोर्स: गूगल

Jul 26, 2019

मकड़ी ने अपने इंजीनियरिंग टैलेंट से एक लंबा धागा बुना.





अक्सर 2 चीज़ों में आदमी हमेशा से कंफ्यूज रहा है.
पहली दया और दूसरी मदद.
पहली कॉमन फॉर आल है और 
दूसरी सेलेक्टिव हो सकती है.

दया स्पिरिचुअल आस्पेक्ट है और मदद करना प्रैक्टिकल आस्पेक्ट.
हम इसे मिक्स करते चलते हैं 
और इसीलिए कंफ्यूज हो जाते है.

एक सेल्फिश आदमी जो
दूसरों के बारें में हमेशा ही लापरवाह है,
उसको मदद मिलना बड़ा ही टफ होगा,
मगर उसको दया की नज़र से कोई भी देख सकता है.
दया प्रार्थना की वाइब्रेशनल थेरेपी है.

आइए,
एक शानदार पुरानी कहानी से जीवन के इस पहलू
को समझने की कोशिश करते हैं.


इसे एक टीचर अपने स्टूडेंट्स को सुना रहे थे.

टीचर ने कहानी स्टार्ट की.

बुद्ध ध्यानमग्न थे.
किसी ने “बचाओबचाओ” की आवाज़ लगाई.
वो समझ गए कि नर्क के गड्ढे में कोई नई एंट्री हुई है
और बंदा परेशानी में है.

फ़िर पता चला कि जब वो बंदा जिंदा था तब
उसने कई सारे क़त्ल, चोरियां 
और किडनैप जैसे घिनोने काम 
अपने बायोडाटा में शामिल किए थे.

महात्मा तो करुणामय होते हैं.
बुद्ध अब उसकी मदद करना चाहते थे.
उन्होंने उसकी लाइफ की सभी फाइल्स चेक की.
उस बंदे ने एक बार एक मकड़ी को अपने पैरों के 
नीचे आने से बचाया था.

उन्होंने उस मकड़ी से उस बंदे की हेल्प करने की रिक्वेस्ट की.
मकड़ी ने यस कहा.
उसने अपने इंजीनियरिंग टैलेंट से मजबूत जाल वाला
एक लंबा धागा बुना और गड्ढे में भेज दिया.

वो बंदा उस धागे को पकड़ कर नर्क के गड्ढे से बाहर आने लगा.
वहां जो दूसरे सज़ा काट रहे कलाकार भी थे,
उनको भी जोश आया और 
वो भी धागे को पकड़ने लगे.

वो बंदा तनाव और चिंता से पसीने-पसीने हो गया.
गुस्से में चिल्लाकर बोला – ये सुविधा मेरे लिए है
और अगर सब इसका यूज़ करेंगे तो ये टूट जाएगा.
उसके इतना कहते ही धागा टूटा 
और वो धम्म से वापिस गड्ढे में गिर गया.

बंदा फिर “बचाओ – बचाओ” मोड में आ गया.
लेकिन इस बार बुद्ध ने उसकी आवाज़ अनसुनी कर दी.

अब टीचर ने स्टूडेंट्स से पूछा – बताओ. स्टोरी में क्या सही नहीं है?

पहले स्टूडेंट ने कहा – 
मकड़ी का धागा कमजोर होता है.

दूसरा बोला – 
नर्क और स्वर्ग जैसी कोई जगह नहीं होती.

तीसरे ने कहा – 
बुद्ध ध्यान करते हुए आवाज़ क्यों सुनेंगे?

टीचर मुस्कुराए और बोले –
ये सभी आंसर क्रिएटिव हैं लेकिन
तुमने सबसे इम्पोर्टेन्ट चीज़ को मिस कर दिया.

स्टूडेंट्स चिल्लाये – वो क्या गुरु जी?
टीचर ने कहा –
एक सच्चा महात्मा दया और करुणा सबके लिए ही बरसाएगा.
वो इसे किसी एक के लिए फिक्स नहीं रख सकता.
जब उस बंदे को मदद का धागा मिला तो भी 
नर्क में भी उसका लालच ये ही रहा कि
सिर्फ़ मैं ही इसे पकड़ कर गड्ढे से बाहर निकल जाऊं.
और 
जब कोई सिर्फ़ और सिर्फ़ स्वार्थी होने लगता है तो
दया का धागा अपने आप टूट जाता है.

स्टोरी में बंदा ही सही नहीं है.
कोई कब तक उसकी हेल्प कर सकेगा?


स्टूडेंट्स को स्टोरी समझ आई और
सबने ख़ूब तालियाँ बजाई.


इमेज एंड स्टोरी सोर्स: गूगल.





Jul 25, 2019

कोचिंग ज़ारी है.





अपने नजरिए से आदमी अपने क़दम आगे बढ़ाता है.
इसे समझदारी कहा गया है.
लेकिन
समय हमसे कहीं पहले अपनी चाल चलता है
और आदमी का हर क़दम फ़िर सीधा पड़ने लगता है.

आप भारतीय परंपरा के
4 युगों के आउटकम में देख सकते हैं.
सतयुग में 2 अलग-अलग दुनिया के बीच फाइट,
देवता और राक्षस.

फ़िर त्रेतायुग यानि रामायण डेज,
2 देश के राजाओं के बीच फाइट,
राम और रावण.

उसके बाद द्वापर युग,
द टाइम ऑफ़ महाभारत,
घर में ही 2 भाइयों के बीच फाइट,
पांडव और कौरव.

और अब हमारे दिन यानि कलयुग डेज.
इम्प्रूवमेंट हुई है.
फ़र्क ये आया है कि
अब फाइट हमारे अंदर हो रही है.
2 तत्वों के बीच फाइट,
दिमाग और दिल.

गुस्सा जल्दी आ रहा है.
भागमभाग अपने चरम पर है.
गिविंग पॉवर फुस्स होने लगी है
स्वभाव में तीखापन और 
दुविधा कांसेप्ट सुपरहिट है.


हर आदमी को लग रहा है कि
उसका हर क़दम बिलकुल सही है
और बाकी सभी लंगड़े है.

आदमी भावहीन हो गए हैं.
दूसरों के लिए वो मदद कम
मुसीबत ज्यादा बन गए हैं.

बढ़ती भीड़ ने इंसानियत को ढक डाला है
और ये कलयुग का ही बोल-बाला है.

कोई भी इसे आसानी से देख सकता है.

और इसीलिए
इन दिनों
सेल्फ-कंट्रोल और पॉजिटिव थिंकिंग को
सबसे बड़ा सब्जेक्ट माना जा रहा है.

लाइफ़ में इसके तड़के से आपके जीवन की सब्जी
में थोड़ा लचीलापन और स्वाद बना रहता है.
संवेदना और स्माइल की गुंजाईश भी बची रह सकती है.

वरना कलयुग में
अब आदमी किसी और से लड़ने के मूड में
रह ही कहा गया है?
वो ख़ुद से ही जूझ रहा है,
इस हद तक कि उसे ये पता रखने में
कोई दिलचस्पी है ही नहीं कि
आजू-बाजू क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है?
उससे ख़ुद का शरीर और दिमाग ही नहीं संभल रहा
तो वो दूसरों का कैसे ख्याल रख सकता है?

स्वयंभू समझदारी का नतीज़ा भी सामने है.
आर्थिक रूप से अमीर दिखता आदमी
मानसिक रूप से गरीब रेखा से नीचे जाने 
की तैयारी में है.
उनकी कोचिंग ज़ारी है.
आदमी से आदमी के हारने की कहानियाँ 
पल-पल घटित हो रही हैं.

लेकिन
समय हमसे कहीं पहले अपनी चाल चलता है
और आदमी का हर क़दम फ़िर सीधा पड़ने लगता है.

हे कलयुग,
तुस्सी ग्रेट हो.

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