Jul 2, 2019

एक चुटकुला जो ऱोज सुनाई देता है. फ्री में कौन किसे पूछता है?





कोई भी क्या चाहता है?
दुनिया की नजरों में रेस्पेक्ट्फुल बने रहना.


हर कोई शोहरत और प्रेस्टीज का मोहताज़ है,
फ़िर चाहे वो उसे घर, सोसाइटी, गली, मोहल्ले, समाज में मिले या कहीं और.


ये एक्चुअली ख़ुद को अच्छा फ़ील कराते रहने की प्रैक्टिस है
और
सब इसे किसी बहाने से करते ही रहते हैं.
कभी कोई एक्स्ट्रोवर्ट हो कर तो कोई इन्ट्रोवर्ट हो कर.


कोई भी दूसरों की नज़रों में उठे ही रहना चाहता है.
पहले छोटे और फ़िर बड़े प्रयास करता है.


अच्छा दिखने की ये चाहत कोई बुरी चीज़ नहीं है
ये फैन फॉलोईंग बढ़ाने जैसा है.

किसी भी देश के युवा,
वहां के एक्टर्स को देखते हैं, प्लेयर्स को देखते हैं, पॉलिटिशियन को देखते हैं,
किसी सीईओ या बड़ी कंपनी के हेड को देखते हैं
और उनकी पॉपुलैरिटी
से बड़े इम्प्रेस रहते हैं.


देखा-देखी वो भी अपने आस-पास अपने फैन देखना शुरू कर देते हैं.
ये ट्रेंड है और ट्रेंड को हर कोई पकड़ लेना चाहता है.
चाहत बस इतनी कि सभी हमें अच्छा, भला और डैशिंग कहते रहें.


हाँ एक केटेगरी ऐसी भी सामने नज़र आती है,
जो फेमस होने के लिए ग़लत और क्रूर काम भी कर डालती है
पर ये साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर है
और
इसे कोई भी अच्छा नहीं कह सकता.
ऐसे लोग मानवता के अपराधी ही हैं,
फ़िर चाहे वो कितने ही फेमस या फैन फोलोविंग रखते हों.


खैर इन्हें छोड़िये.

सच का एक हिस्सा ये भी है कि
तारीफ़ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता?
और अगर आप किसी भी एंगल से अच्छे हैं
और लोगों के दिलों को टच करते हैं
तो ये कितनी अच्छी बात है.
और
तभी शायद लोग आपको फ़ॉलो करते होंगे.
फ्री में कौन किसे पूछता है?

यक़ीनन
लाइफ़ एक चुटकुला है जो ऱोज सुनाई देता है.
ख़ाली शांति हो और सम्मान ना हो तो यहाँ आदमी उदास हो ही जाता है.
ख़ाली सम्मान हो और शांति ना हो तो आदमी फ़िर भी काम चला ही लेता है.


बड़ा दिखने का ये सफ़र निराला होता है.
किसी फ़िल्म की कहानी की तरह आप आगे बढ़ते चलते हैं.
और कई सालों बाद एक दिन आप जब आराम से बैठते हैं
और सोचते हैं कि मेरी फ़िल्म कैसी थी?
तो अचानक हंस पड़ते है
क्योंकि स्टार्टिंग में तो ये सब करना वाह-वाह फ़ील करा रहा था  
पर बाद में ये निहायत ही पकाऊ और बोरिंग लगने लगा.


वैसे भी कोई कब तक एक चीज़ को खींचते और घिसते रह सकता है?
ये जीवन की रेसिपी को अपने तरीके से पकाने जैसा है.
कुछ दिनों बाद इसमें से बदबू आने लगती है
पर चूंकि हर कोई अपने एक्सपीरियंस को ही सच मानता है
तो जब तक वो ख़ुद नहीं भुगत लेता – मानेगा थोड़ी.


एक सीक्रेट मस्त बात ये भी है कि
अच्छा और भला दिखने की एक्टिंग करना बड़ा टफ है
लेकिन सचमुच में अच्छा या भला बनना बड़ा ही आसान हैं.

और समय का चक्र आज नहीं तो कल
सबको अच्छा बना कर ही दम लेता है.

आप भी एक बार अपनी फ़िल्म दोबारा देखना.

इमेज सोर्स: गूगल


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