Jul 25, 2019

कोचिंग ज़ारी है.





अपने नजरिए से आदमी अपने क़दम आगे बढ़ाता है.
इसे समझदारी कहा गया है.
लेकिन
समय हमसे कहीं पहले अपनी चाल चलता है
और आदमी का हर क़दम फ़िर सीधा पड़ने लगता है.

आप भारतीय परंपरा के
4 युगों के आउटकम में देख सकते हैं.
सतयुग में 2 अलग-अलग दुनिया के बीच फाइट,
देवता और राक्षस.

फ़िर त्रेतायुग यानि रामायण डेज,
2 देश के राजाओं के बीच फाइट,
राम और रावण.

उसके बाद द्वापर युग,
द टाइम ऑफ़ महाभारत,
घर में ही 2 भाइयों के बीच फाइट,
पांडव और कौरव.

और अब हमारे दिन यानि कलयुग डेज.
इम्प्रूवमेंट हुई है.
फ़र्क ये आया है कि
अब फाइट हमारे अंदर हो रही है.
2 तत्वों के बीच फाइट,
दिमाग और दिल.

गुस्सा जल्दी आ रहा है.
भागमभाग अपने चरम पर है.
गिविंग पॉवर फुस्स होने लगी है
स्वभाव में तीखापन और 
दुविधा कांसेप्ट सुपरहिट है.


हर आदमी को लग रहा है कि
उसका हर क़दम बिलकुल सही है
और बाकी सभी लंगड़े है.

आदमी भावहीन हो गए हैं.
दूसरों के लिए वो मदद कम
मुसीबत ज्यादा बन गए हैं.

बढ़ती भीड़ ने इंसानियत को ढक डाला है
और ये कलयुग का ही बोल-बाला है.

कोई भी इसे आसानी से देख सकता है.

और इसीलिए
इन दिनों
सेल्फ-कंट्रोल और पॉजिटिव थिंकिंग को
सबसे बड़ा सब्जेक्ट माना जा रहा है.

लाइफ़ में इसके तड़के से आपके जीवन की सब्जी
में थोड़ा लचीलापन और स्वाद बना रहता है.
संवेदना और स्माइल की गुंजाईश भी बची रह सकती है.

वरना कलयुग में
अब आदमी किसी और से लड़ने के मूड में
रह ही कहा गया है?
वो ख़ुद से ही जूझ रहा है,
इस हद तक कि उसे ये पता रखने में
कोई दिलचस्पी है ही नहीं कि
आजू-बाजू क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है?
उससे ख़ुद का शरीर और दिमाग ही नहीं संभल रहा
तो वो दूसरों का कैसे ख्याल रख सकता है?

स्वयंभू समझदारी का नतीज़ा भी सामने है.
आर्थिक रूप से अमीर दिखता आदमी
मानसिक रूप से गरीब रेखा से नीचे जाने 
की तैयारी में है.
उनकी कोचिंग ज़ारी है.
आदमी से आदमी के हारने की कहानियाँ 
पल-पल घटित हो रही हैं.

लेकिन
समय हमसे कहीं पहले अपनी चाल चलता है
और आदमी का हर क़दम फ़िर सीधा पड़ने लगता है.

हे कलयुग,
तुस्सी ग्रेट हो.

इमेज सोर्स: गूगल

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