Aug 29, 2019

कोई एक चीज़ भी कम पड़ी, तो आप गए काम से.





आज नेशनल स्पोर्ट्स डे है.
क्यों?
क्योंकि आज का दिन मेजर ध्यानचंद जी 
को समर्पित है.
हाँ, हॉकी के महान जादूगर ध्यानचंद.

और हम उनसे जुड़कर खेल को और 
खेल भावना को रिस्पेक्ट देना सीखें,
इसलिए स्पोर्ट्स डे मनाने की परंपरा का 
आग़ाज हुआ.

स्पोर्ट्स वो ही तरीके से खेल सकता है जो फ़िट हो.
फ़िट बोले तो मेंटली, फिजिकली और स्पिरिचुअल फ़िट.
कोई एक चीज़ भी कम पड़ी तो आप गए काम से.

जलन और नफ़रत के बिना खेलना ही स्पोर्ट्स है,
आप चाहे किसी भी मैदान में हो या 
फ़िर जिंदगी के ट्रैक पर.
जेन्युइन स्पोर्ट्समैन बनने के लिए आपको
एक शानदार इंसान बनने की हमेशा ज़रूरत रहेगी.

जिसने कभी स्पोर्ट्स नहीं खेला और 
जिसने कभी दर्द नहीं झेला,
उसका यहाँ आना नदी में बह रहे 
उस पत्ते की तरह है जो
हमेशा ये सोचता है कि नदी को 
मैं ही कहीं लेकर जा रहा हूँ.

अन्यथा कोई भी खिलाड़ी ये आसानी से 
जान सकता है कि
हर बार वो ही चैंपियन बना नहीं रह सकता और
हर बार उसे हार ही नसीब हो, ये भी ज़रूरी नहीं.

तो
इस नेशनल स्पोर्ट्स डे पर अगर आप
ख़ुद को ये याद दिला सकें कि
सिर्फ़ खेलना ही आपके हाथ में है, रिजल्ट नहीं
तो यकीन मानिए कि आप शानदार खेलेंगे.

फ़िर जीत या हार का असर आप पर होना
बंद हो जायेगा क्योंकि आप जान सकेंगे
खेलने का प्रोसेस अहम है, बाकी सब टेम्पररी.

अब आप देख सकेंगे
कि मेजर ध्यानचंद को हॉकी का 
जादूगर क्यों कहा गया?
उन्हें भुलाया भी जा सकता था.

इतिहास हमेशा सिखाना चाहता है कि
भविष्य का आधार कैसे बनता है?

स्पोर्ट्स की ये ही महानता है.
वो आदमी के लिए कम, 
उसके समर्पण के लिए तालियाँ बजवाता रहा है.

और दुनिया वेट कर रही है कि
आपके लिए भी तालियाँ बजाएं.
आप का फेवरेट गेम कौन सा है?


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Aug 27, 2019

टेक्नोलॉजी, बेबसी, रानू मंडल और किस्मत.





टेक्नोलॉजी और किस्मत जब साथ देते हैं
तो रंगत बदल सकती है.
ऐसा ही एक लेटेस्ट चमत्कार देखने को मिला 
पश्चिम बंगाल के रेलवे स्टेशन पर.

भारतीय बच्चे ख़ुद चाहे कैसे भी हों लेकिन 
उन्हें पेरेंट्स स्मार्ट और अमीर ही चाहियें.

बताया जा रहा है कि
अच्छे लुक्स ना होने की वजह से एक बेटी 
ने अपनी माँ को लगभग 10 साल पहले 
बेसहारा रहने और भटकने के लिए
रेलवे स्टेशन पर ही छोड़ दिया था.

लेकिन समय बदला,
सोच बदली,
टेक्नोलॉजी बदली,
स्टार्स बदले
और उसी बुरे लुक्स वाली रानू मंडल ने स्टेशन पर
गाना-गाते गाते अपना सफ़र ज़ारी रखा.

अचानक किसी अतेंद्र चक्रवर्ती जैसे 
सोशल वर्कर का वहां से गुजरना हुआ
और उसे रानू की आवाज़ को गहराई से 
सुनने का मौका मिला.
उनकी गले की मिठास देख
उसके दिल से कोई आवाज़ ज़रूर निकली होगी.

अब अतेंद्र ने उनके गाना की एक विडियो बनाई
और सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी.
देखते ही देखते विडियो वायरल हो गया.

भटक भटक कर और अटक अटक कर
लाइफ़ की तकलीफों को ही
भगवान् मान बैठी रानू मंडल की किस्मत ने करवट ली
और कुछ ही पलों में वो देश की 
सिंगिंग सेंसेशन बन गयी.

लता जी के गाने गाकर अपना 
पेट पालने वाली एक बुरी लुक्स की लेडी
को लाइफ़ ने एकाएक शानदार लुक्स से नवाज़ दिया.
पोपुलर और हेल्पफुल म्यूजिक कंपोजर हिमेश रेशमिया ने जब रानू का विडियो देखा
तो उनकी आवाज़ के कायल हो गए और
जल्द ही रिलीज़ होने वाली एक फ़िल्म में उन्हें बतौर सिंगर लांच कर दिया.
किस्मत के इस खेल ने रानू मंडल की हारी-थकी-उदास जिंदगी को पल भर में जीत दिला दी.
जीत के राजा बने अतेंद्र और हीरा तराशने वाले जोहरी बने हिमेश रेशमिया.

आज रानू की बेटी भी प्यार के दावों से लबरेज है
और ख़ुद रानू मंडल को तो भरोसा ही 
नहीं हो रहा कि सबकुछ बदल चुका है.

कल तक अमावस्या की तरह जीने वाली 
रानू मंडल को आज पूरा देश प्रेरणा, जूनून 
और पूर्णिमा के चाँद की तरह सर-माथे 
पर बिठा चुका है.

और सच तो ये है कि ये सब एक पल 
का खेल नहीं है.
इसके लिए रानू मंडल ने अनंत पलों की 
अपनी उदासी और बेबसी को
अपनी आँखों में छुपाकर बार-बार 
आसमान की तरफ ज़रूर देखा होगा.

आज ऊपर से बारिश की बूंदे टपक पड़ी हैं
और इन्द्रधनुष ने उनके जीवन के
सभी काले रंगों को रंगीन कर दिया है.
अब उनके मुस्कुराने का समय है.
और उनकी आवाज़ की खूबसूरती के जगमगाने की
आहट शुरू हो गयी है.

ये सुकून के पल अब उन्हें हमेशा के लिए मिलते रहें.
भारतीय रेलवे स्टेशन और लोग, 
दोनों ही क्लासिकल होते हैं.


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तेरे जितनी समझदार पत्नी तुझे मिलेगी भी या नहीं?





बड़ी बातें और बड़े रहस्य जानने - समझने ले लिए
ये ज़रूरी नहीं कि आपको किसी 
बड़े शहर में शिफ्ट होना होगा.
ये सब एक छोटे शहर में जान लेना ज्यादा आसान, रोचक और सस्ता हो सकता है?
कैसे?
आम जिंदगी की एक प्रैक्टिकल कहानी से इस मैनेजमेंट फंडे को जानने की कोशिश करते हैं.

एक छोटा शहर हिम्मतपुर.
उसमें एक कॉलोनी. नाम – एकता कॉलोनी.
वहां एक फेमस समोसे की छोटी सी दुकान. 
नाम – स्वाद स्वीट हाउस.
दुकान के मालिक आत्माराम.
समोसे का स्वाद बेमिसाल और फ्रेश.
क्योंकि हर बार नए तेल का इस्तेमाल.
साथ में खट्टी-मीठी चटनी.
हर कस्टमर के मुहं से बस वाह-वाह.
दुकान पर खाने और पैकिंग सुविधा से रोज लगभग 600 समोसों की सेल.
बासी बचे समोसों की कोई रीसाइक्लिंग नहीं.
कस्टमर्स को केवल और केवल फ्रेश तेल से बने एकदम ताज़ा समोसे.
क्वालिटी और सर्विस – दोनों ही जानदार.

अब आत्माराम जी ठहरे छोटे से बिजनेसमैन.
और उनके लड़के ने कर ली एक बड़ी यूनिवर्सिटी से MBA.

लड़का अपडेट से भरा हुआ.
पिता से कहा- डैडी, न्यूज़ है कि मंदी आने वाली है,
हमें Cost Cutting करके पैसे बचाने चाहियें.
ये इमरजेंसी में काम आयेंगे.

लड़का तो लड़का है.
पिता पुराने ज़माने के और कम पढ़े-लिखे भी.
बोले – अब मैं थक लिया हूँ, तू ही संभाल बेटा ये दुकान.
सब तेरा ही तो है.

बेटा ख़ुश. थ्योरी से प्रैक्टिकल सक्सेस के लिए 
इससे बड़ा मौका और कहाँ?
बोला- डैडी, कल से हम 70% फ्रेश और 
30% पिछले दिन वाला तेल इस्तेमाल करेंगे.
आत्माराम ने कहा – ओके.
अगले दिन ऐसा करने पर समोसों का स्वाद थोड़ा फीका. फ़िर भी सेल पूरी.
लड़का ख़ुश- डैडी, 30% तेल के पैसे बच गए.
पिता बोले – ये तो तेरे पढ़ने-लिखने का जादू है.


अगले दिन बेटे ने खट्टी चटनी की सर्विस भी 
बंद कर दी
और पुराने तेल की क्वांटिटी 40%.
समोसे बिके 400.
लड़का बोला – देखा डैडी, मैजिक ऑफ़ Cost Cutting.

उससे अगले दिन मीठी चटनी और पतली 
+ पुराने तेल की क्वांटिटी 60%.
टिश्यू पेपर देना भी बंद.
लड़के ने बनवाए सिर्फ़ 300 समोसे और बिके 200.
स्वाद किरकिरा सा लेकिन
आत्माराम को देख पुराने कस्टमर्स
अभी भी उम्मीदों से भरे.

मैनेजमेंट की इस अनोखी ब्रांडिंग से
सप्ताह के आखिरी दिन,
लड़का पूरे फ्लो में.
पुराने तेल का इस्तेमाल 80% 
+ चटनी भी पानी जैसी
और समोसे बनाए केवल 100.
एक भी समोसा नहीं बिका.
Cost Cutting का उसका फ़ॉर्मूला 
उसकी नज़र में सुपरहिट
लेकिन दुकान पर सन्नाटा.
लड़का ख़ुश.
पिता हैरान.

लड़के ने ख़ुशी भरी आँखों से पिता से कहा –
देखा डैडी, मैंने कहा था ना, कि मंदी आने वाली है.
आज तो हमनें पूरे पैसे ही बचा लिए.

आत्माराम ने बड़े प्यार से अपने लड़के का हाथ 
पकड़ा और उसे घर भेजते हुए कहा –
बेटे, भगवान् का लाख-लाख शुक्र है कि 
तू पढ़ - लिख लिया
और मुझ जैसे अनपढ़ को समझा सका कि 
Cost Cutting क्या होती है.

कल से चुपचाप समोसों की प्लेटें धोने बैठ जाना.
मंदी से मैं अपने आप निपट लूँगा.

या फ़िर अपनी पढ़ाई को आगे लेकर जाना
और किसी बड़े शहर में बड़ी कंपनी में
इस Cost Cutting के फंडे का प्रैक्टिकल करना.
तेरी शादी अभी पेंडिंग है
और मुझे डर है कि तेरे जितनी समझदार पत्नी 
तुझे मिलेगी भी या नहीं?




इमेज एंड आईडिया सोर्स: इंटरनेट

( सभी पात्र काल्पनिक. हास्य से मंदी के प्रोसेस को जानने का एक छोटा सा प्रयास)