Aug 22, 2019

वो शाम, कॉलोनीवासियों के लिए एक यादगार शाम साबित हुई.





एक शहर की एक छोटी कॉलोनी में 
एक आदमी रहता था. नाम था खुशीराम.

नाम के विपरीत, स्वभाव से पूरा एसिडिक.
एसिडिक बोले तो खटास भरी पर्सनालिटी.

वो बड़ा ही भाग्यशाली और 
कॉलोनी के लोग बड़े दुर्भाग्यशाली.
उस आदमी से सभी दूर भागते.
कोई भी उससे, कभी भी मिलता तो 
वो ऐसे उदास होकर मिलता मानो
अभी-अभी उसका कोई गुजर गया हो 
या गुजर जाने की तैयारी में व्यस्त हो.

और तो और,
वो जैसे ही अपना मुहं खोलता,
वैसे ही उसकी शिकायतों की बाढ़ आनी शुरू हो जाती.

बड़ी-बड़ी और महान शिकायतें,
जिन्हें हज़म करने की औकात, 
कॉलोनी में किसी के बस की बात नहीं थी.
हमेशा बुरे मूड में बने रहना, 
उस आदमी की गरिमा में 4 चाँद लगा देता था.

उसकी शक्ल देख कर सबको ऐसा ही लगने लगता  
कि जीवन कितना बेचारा है.
अच्छे-भले मूड वाले लोग भी उससे मिलकर 
दुखों के दलदल में तैरना शुरू कर बैठते.

धीरे-धीरे वो आदमी बुजुर्ग होने लगा.
उम्र लगभग 75 पार कर चुकी थी.
मगर, पहले से भी ज्यादा धारदार और जहरीला.

उसके साथ ख़ुश रहने की कल्पना कर पाना, 
दिन में तारे देखने के समान था.
अपनी नज़र में वो आदमी, हर पल सही था.
दूसरे मगर उससे हमेशा नाख़ुश ही रहते.

सब अपनी उम्मीदें छोड़ ही चुके थे कि
अचानक एक दिन सबने उसे बहुत ख़ुश देखा.

ये असाधारण रूप से हैरान करने वाली घटना थी.

लोगों में ख़ुसर – पुसर जारी थी कि
आखिर ये चमत्कार कैसे हो गया?

वो दुखी आत्मा आज ना उदास थी और
ना ही उसे किसी से कोई शिकायत हो रही थी.
फ्रेश लुक और मुस्कराहट के साथ सबसे मिलना.
सालों बाद, अचानक सबकुछ उल्टा?

लोग अचंभे से कभी उसे देखें और कभी आसमान को.
पूरी कॉलोनी उस शाम मंदिर के पार्क में इकठ्ठा हुई.
उस बुजुर्ग से कॉलोनी के प्रधान ने पूछा – महाशय, कुछ बताइए?

ऐसा क्या मिल गया है, 
जो आप एकाएक बदल गए?

उसने बिना चिढ़े कहा – पिछले 75 सालों से, 
मैं ख़ुशी का पीछा कर रहा था, 
मगर कभी उसे पकड़ नहीं सका.
कल रात मैंने तय किया कि 
अब से पीछा करना बंद.

मैं देखना चाहता था कि क्या 
मैं ख़ुशी के बिना भी जी सकता हूँ या नहीं?
मैंने जीवन के सभी पहलुओं को, दिल खोलकर 
स्वीकार कर लिया.
उसके बाद मेरी उदासी, मेरी शिकायतें और 
मेरा बुरा वक़्त सभी गहरी नींद सो गए.
और देखो, आज आप सभी को भी 
कितना अच्छा लग रहा है.
अब मैं जीवन के असली रंग का आनंद ले रहा हूँ.
मेरे अंदर इस समय कोई घबराहट, 
कोई शिकवा, कोई नफ़रत नहीं बची.


उसके मुहं से ये सब सुनकर सबने 
ज़ोर से तालियाँ बजाई,
और वो शाम कॉलोनीवासियों के लिए 
एक यादगार शाम साबित हुई.

लोग बताते हैं कि इन दिनों 
खुशीराम से मिलने बहुत भीड़ आती है.



इमेज सोर्स: गूगल

(सभी पात्र काल्पनिक है)






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