Aug 26, 2019

विकास की 3 - डायमेंशनल तस्वीर कैसी होगी?





आपकी तरह पूरा देश भी
कभी ख़ुशी - कभी गम के गाने गा रहा है.

अभी हमनें जन्माष्टमी मनाई. कान्हा को याद किया.
उससे पहले सुषमा जी और फ़िर जेटली जी चले गए.
कल ही पी.वी. सिंधु वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियन बनी.

सुख और दुःख भी साथ-साथ दौड़ लगाते हैं.
जिंदगी हर पल बदल जाती है.
अपने हिसाब से रास्ता तय करती है.

हम इसे देख सकते हैं और
रिएक्शन के अलावा कुछ कर नहीं सकते.
कुछ अच्छा होने की ख्वाहिश के साथ,
बस अपनी उम्र कम किए जाते हैं.

इन सब के बीच आर्थिक मंदी की आहट ने
मौसम का तापमान हॉट कर दिया है.

धंधा है पर मंदा है ये.

इन्वेस्टमेंट घटने की ख़बरें शोर मचा रही हैं.
बिज़नेस प्रोडक्शन डाउन बताया जा रहा है और
शेयर बाज़ार भी डरा - डरा सहमा सा है.

मिनिस्ट्री राहत के ऐलान कर रही है और
उनके अनुसार घबराने की कम ज़रूरत है.
लेकिन
ग्राउंड-लेवल पर मंदी के काले बादल 
छाए हुए लग रहे हैं.
एक्सपर्ट्स इसका असर टॉप बिज़नेस सेक्टर्स 
जैसे ऑटो, रियल एस्टेट,
टेलिकॉम, बैंकिंग, स्टील, टेक्सटाइल आदि 
पर देखने की कोशिश कर रहे हैं.

सवाल निकलता है कि आखिर क्यों बाहर से
भाग- भाग कर आती है भारत में आर्थिक मंदी?

टॉप 4 कारण होते हैं - 
इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि

डॉलर के मुकाबले रूपए की वैल्यू कम हो जाना

इम्पोर्ट के मुकाबले एक्सपोर्ट का गिरना

चाइना और अमेरिका ट्रेड वार से मंदी का इफ़ेक्ट 
भारत पर पड़ना


देश के अंदर भी इकोनोमी डाउन होना मतलब
डिमांड और सप्लाई का मिसमैच और इन्वेस्टर्स नदारद.

रिजल्ट्स के रूप में
जॉब्स जाने लगती हैं और
आगे के लिए रोटी जुटाने का डर सताता रहता है.

कोई भी सरकार कोशिशें ज़ारी रखती हैं
ताकि बिज़नेस और जॉब्स को बचाया रखा जा सके.

समय सबको आगाह करता रहता है कि 
संभल कर चलो.

सबके लिए अच्छा सोचना,
अच्छा करना और उससे अच्छे रिजल्ट्स निकाल पाना,
ये एक लंबी और सिस्टेमेटिक प्रक्रिया है.


उम्मीद पर दुनिया कायम है
और यहाँ सुकरात की ये लाइन सुकून दे सकती है कि
“ये भी बीत जायेगा“.
या
हरिवंशराय बच्चन की कविता की पंक्ति
“कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती”.

बाकी बड़े-बड़े दिग्गज मंदी की बारीकियों 
पर नज़र बनाए हुए हैं,
देखो,
विकास की 3-डायमेंशनल तस्वीर कैसी होगी?


इमेज एंड इनफार्मेशन सोर्स: गूगल


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