Aug 4, 2019

बचपन की दोस्ती और क्रिकेट.






जब बात दुनिया के सबसे बेहतरीन पलों की आती है
उनमें सबसे क्लासिकल मोमेंट्स हैं दोस्ती के किस्से.
अगर कोई आपसे पूछना शुरू करे तो कितने ही दिन
ये बताने में ही बीत जायेंगे कि 
क्या शानदार सफ़र रहा था.


दोस्ती.
याद आता है
होली का वो दिन
जब सभी कॉलोनी के दोस्त
और पास की ललिता लाइन के दोस्त एक साथ
रंगों का इंद्रधनुष लिए एक दूसरे को रंग दिया करते थे.
क्या बात थी.
सिर्फ़ मुस्कराहट. सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनापन.


दोस्ती और क्रिकेट.
रुद्रा कॉलोनी के शिव मंदिर के पीछे की वो ख़ाली जगह
ओमी भाईसाहब, संजय भाईसाहब और गोपाल भाईसाहब की कोचिंग टिप्स
हमारा किरण मौरे जैसा विकेटकीपर मुरारी
अम्ब्रोस जैसा फ़ास्ट बॉलर हरिंदर.

हम छोटे-मोटे प्लेयर्स लेकिन
हमारे मेंटर इतने क्लासिक कि हमें 
हमेशा महानता का फ़ील कराते.
फ़िर हम अपनी औकात से भी ज्यादा 
अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश करते
और कभी कभी कामयाब भी हो जाते.
सी लाइन के शलेश एंड टीम से कड़ी टक्कर होती रहती थी.

सुबह-दोपहर-शाम सिर्फ़ और सिर्फ़ दोस्ती और 
खेल के नाम.
TIT प्लेग्राउंड में दिन – रात खेलना. कभी क्रिकेट, कभी फ़ुटबाल.

दीपू, मुंडी, राजू, रामपाल, मुकेश भाई, चंदा, हेमराज, उमेश, जोशी जी.
कपिल देव और चेतन शर्मा भी आते थे उस समय वहां.

हम पानी भी वहीँ से भरकर लाते थे.
कमाल के दिन थे
और 
कमाल के लोग.


कई बार मैच खेलने के लिए 2–2 रूपए फ़ीस 
भी चुकाने पड़ते थे
ऐसा लगता था जैसे किसी बैंक को करोड़ो का कर्ज़ा दे रहे हों.
लेकिन दोस्ती और खेल का ऐसा क्रेज कि IPL भी बौना लगे.

पढाई साथ-साथ चलती रही और यादें भी.
फ़िर शहर ने बाहर का रास्ता दिखाया
और चीज़ें बदल गयी.
जिंदगी की दूसरी पारी स्टार्ट हो गयी
लेकिन फ़ायदा ये रहा कि जो कुछ भी बचपन का डाटा-बेस था
उसकी फीडबैक के साथ ख़ुश रखने की लय बरकरार रही.

कभी-कभी बहुत याद आती है
और मन करता है
कि जिंदगी की वो ही पिच हो
वो ही खिलाड़ी
और वो ही माहौल.

वो सचमुच स्वर्ग ही था.
और इसी वजह से शायद
आज हम जहाँ भी हैं और जैसे भी हैं,
उसे स्वर्ग बना कर ही रखना चाहते हैं.
बिना किसी कड़वाहट के.
बिना किसी संदेह के.

जब भी आपका मन कभी असली जीवन की 
ख़ोज करे तो
आप बचपन और दोस्ती से स्टार्ट कर सकते हैं.

बचपन और दोस्ती के आगे
बड़ी गाडी, बड़ा बंगला, बड़ा बैंक बैलेंस, सफ़लता की बातें -
ये सब बहुत छोटी चीज़े हैं.

दोस्ती जीवन के विस्तार की अनकही दास्ताँ है.
आजकल वैसा बचपन या दोस्ती का दौर नहीं रहा क्योंकि
टेक्नोलॉजी और मानवीय स्वभाव की जटिलता के विस्फोट से
जनरेशन पोस्ट-पेड से प्री-पेड में बदल गयी.
सेफ मोड ज्यादा प्रैक्टिकल हो उठा.

हमारे सफ़र में इतनी प्रोग्रेस नहीं थी 
तो डर भी बहुत कम था.
वो यकीं और विश्वास के दिन थे.

आज सक्सेस का तालाब ही टेंशन से भरा हुआ है.
पहले देने पर ज़ोर था. आज लेने पर ज्यादा है.

लेकिन स्वर्ग बनाना आपके ही हाथ में है.
क्योंकि सिर्फ़ मन को सही दिशा में ले जाना है
और जीवन मुस्कुरा उठेगा.


इमेज सोर्स: गूगल



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