Sep 1, 2019

सफ़ल आदमी मिलना आसान है. ख़ुश आदमी मिलना मुश्किल.




आपकी वजह से आपके आस-पास के जीवन में 
उदासी छाई है या मुस्कुराहट?
बस इतना छोटा सा सवाल, 
आज करोड़ों रूपए का सवाल है.

आप सफ़लता के पीछे भाग रहे हैं.
या यूँ कहें कि आप नहीं, 
केवल आपका मन ऐसा चाहता है.

बढ़ती उम्र के साथ हर कोई किसी 
दूसरे की नज़र में सुपीरियर दिखना चाह रहा है.
ये आपको मिल रही उस मस्त एजुकेशन 
और काल्पनिक डर का कमाल है, 
जो सफ़ल होने की डिमांड को
लगातार ऊँचाइयों पर ले जा रही है.

आप भी इस मकड़ी-जाल के फेर में उलझे हुए हैं,
क्योंकि और दूसरा कोई रास्ता ना तो 
आप देखना ही चाहते हैं,
और ना ही किसी और के पास 
इतना वक़्त बच पाता है,
कि वो आपकी इस समस्या का हल कर दे.
All आर बिजी, You Know?

मनुष्य जीवन में इतनी कॉमेडी पहले शायद नहीं थी.
इसीलिए अब हर कोई एक दूसरे पर हँस सकता है
और ऐसा करके ही लोग टाइम - पास कर रहे हैं.

क्या लोगों के पास अपने अंदर की कोई 
ऐसी चीज़ नहीं जिससे वो इम्प्रेस हो सकें
और उन्हें ख़ुश रहने के लिए किसी और के 
नाम से टाइम - पास की भीख ना मांगनी पड़े –
ये आज के इस लेख का सबसे बड़ा सवाल है?

अमीर बने रहना चल सकता है लेकिन
ख़ुश रहना – ये कोई और आपको तभी दे सकता है
जब उसका ख़ुद का पेट खुशियों से भरा हो.

और कमाल देखिए कि
आपको सफ़ल लोग तो मिल जाते हैं लेकिन
ख़ुश आदमी मिलना कितना डिफिकल्ट है.

आप चाहें तो कोशिश करके देखिए.
एक सफ़ल आदमी कंजूस हो सकता है लेकिन
एक ख़ुश आदमी में आपको दानवीरता 
की झलक ही दिखाई देगी.
और आप किसी सफ़ल भूखे से खाना मांगते हैं तो
वो आपको खिला दे – इसमें थोड़ा संदेह बना रहता है.
वो चीज़ों को लंबा खिंचता है और
बाद में ना-नुकर से आपको निराश ही कर देता है.


वरना आप देखिए
कि इन दिनों इतने सारे सफ़ल लोगों के 
होते हुए भी कुत्ते आपको ज्यादा प्रिय हैं.

इतने सारे दोस्तों और रिश्तेदारों की फ़ौज में कितने आपको दिल के करीब महसूस होते हैं?

इतने सारे बिज़नेस या नौकरी आप्शन के 
बाद भी आपको कितना अकेलापन है?

असल में किसी और की ही तरह,
सही तरीके से रोज़ी-रोटी चलने के साथ-साथ
आप थोड़ा प्यार, थोड़ी केयर ही चाहते हैं
और फ़िर प्यार देने वाले के लिए जान भी दे 
सकने की हिम्मत रखते हैं.
ये कितना खुबसूरत विचार है लेकिन क्या
आपको ऐसा कोई मिल पाता है.
और गलती से मिल भी जाए तो
आपकी लाइफ़ में उसके परमानेंट 
वैसे ही बने रहने की क्या गारंटी है?

तो
आदमी क्या करे?
उसे ये सब चीज़ें ख़ुद में तलाशनी होंगी.
ख़ुश रखने के लिए ख़ुद पहल करनी होगी.
वरना दुखी लोग भी लंबा जीवन जीते ही हैं.

ऐसा कुछ हार्ड एंड फ़ास्ट रूल नहीं है कि
कौन सफ़ल है और कौन असफ़ल.
कुछ लंबी उम्र को सफ़लता मानते हैं.
कुछ लंबे बैंक बैलेंस को.
कुछ लंबे रिलेशनशिप्स को
कुछ मुक्ति को
तो कुछ पल-पल में जी लेने को.

कुल मिलाकर
बस बात इतनी सी है कि
आप अपना दिमाग कौन-कौन सी बातों से 
ख़राब कर लेते हैं,
और कौन-कौन सी बातों से ठीक.

और सोचिये
कि इस दुनिया में कौन नहीं मांग रहा है?
और जो भी मांग रहा है
उसे अलविदा होने से पहले तक
इंतजार करना तो सीखना ही पड़ेगा?
कोई और चारा है भी नहीं.

याद रखिए कि
जब तक आपकी फाइनल प्लेसमेंट नहीं हो जाती,
तब तक हर किसी की तरह
आपको भी चिंता होगी,
साइकोलॉजिकल धोखे और झटके सहने होंगे,
सफ़लता – असफ़लता के नाटक का हिस्सा बनना होगा,
हँसना – रोना – उदासी – उत्साह – उम्र – 
बीमारी- अमीरी- गरीबी आदि पैरामीटर्स के 
अप-डाउन से दो-दो हाथ करने ही होंगे.



हालांकि कुछ मन जो ये समझना चाहते हैं
कि वो इस धरती पर क्या सिर्फ़ काग़ज बटोरने 
या सफ़लता का लेबल लगवाने के लिए पधारे हैं?
उनके लिए कुछ दूसरे रास्ते या मंज़िले अपना नेटवर्क खोल सकते हैं.

ख़ुद से ऐसा सवाल पूछ पाना भी अपने वजूद को
अपडेट करने की एक शानदार कोशिश हो सकती है.


दूसरों की नज़र में आप क्या हो – 
ये दूसरों का विचार हो सकता है.

अपनी नज़र में क्या आप एक सफ़ल मनुष्य 
बनकर जाएंगे – बस आपका अपना विचार 
इतना तो होना ही चाहिए.

क्या ये ही सफ़ल होने की निशानी होनी चाहिए,
ये आपको तय करना है,
एक दिन अचानक गायब हो जाने से पहले.



इमेज सोर्स: गूगल




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