Sep 2, 2019

ज़बरदस्त एवरग्रीन डायलाग. “मुझे तुमसे ये ही उम्मीद थी.”




“मुझे तुमसे ये ही उम्मीद थी.”
ये सबसे अनोखा डायलाग है जो अक्सर
फिल्मों के साथ - साथ आम जिंदगी में भी
जबरदस्त डिमांड में रहता है.
जैसे ही ये डायलाग किसी के कानों में बजता है,
पारले 50 – 50 बिस्कुट की फ़ील सी आने लगती है.
कभी मीठा तो कभी खट्टा.
दोनों फ्लेवर एक कॉमन डायलाग में.

एक्चुअली इस डायलाग से एक नार्मल आदमी को
क्लियर ही नहीं होता कि आख़िरकार 
इसमें सही और ग़लत है क्या?
अगर कोई किसी के लिए अच्छा कर दे 
तो भी ये फ़िट बैठ जाता है,
और अगर कोई किसी के लिए कुछ 
अच्छा ना कर सके,
तो भी ये फिट ही बैठा रहता है.

एक बाप अपने बच्चों से जब ये कहता है, 
तब भी हँसी आती है
पति - पत्नी के बीच की नोंक-झोंक में 
भी ये एक सक्सेसफुल डायलाग है.
लवर्स के बीच भी ये एक केमिकल लोचे का
काम कर जाता है.

बिज़नेस या ऑफिस में भी आप,
अलग-अलग लोगों के बीच के अनुभव को गर देखें
तो उस समय ये आउटपुट इंडिकेटर बनकर
लालबत्ती जैसा मुस्कुराता मिलता है.
किसी आर या पार की लड़ाई में ये एक बहुत
बड़े इमोशनल हथियार के रूप में भी खड़ा मिलेगा.

एक मालिक अपने नौकर को समय पर 
कुछ और दे या ना दे,
लेकिन कभी ना कभी, ये डायलाग देगा ज़रूर.

एक गुरु अपने स्टूडेंट को,
एक सीनियर अपने जूनियर को,
एक बड़ा अपने छोटे को,
एक ज्यादा पढ़ा-लिखा अपने से कम पढ़े लिखे को,
इसी डायलाग की मदद से संबोधित करते 
हुए फ़क्र का एहसास लेते हैं.
इसे आप प्राणायाम डायलाग भी कह सकते हैं –
गहरी आह भरी सांस.

तो गर कभी आपको भी ये सुनने को मिल जाए कि
“मुझे तुमसे ये ही उम्मीद थी.”
तो घबराने की ज़रूरत नहीं है.
आपको भी उनसे ऐसे की उम्मीद कहाँ थी?

और अब तो वो डायलाग भी दम तोड़ने वाला है कि
“उम्मीद पर दुनिया कायम है”.

आपको पता होना चाहिए कि
दुनिया अपनी किसी भी चीज़ पर 
कायम नहीं रह सकती.
क्यों?
क्योंकि
पृथ्वी गोल है भई.
और गोल धरती पर सब या तो घूम सकते हैं
या घुमा ही सकते है.
यहाँ टिके रहने का कोई रिवाज़ नहीं है.

वैसे दुनिया खुबसूरत तो है.
घूमने या घुमाने वाली हर चीज़ खुबसूरत होती है,
फ़िर चाहे वो पृथ्वी हो, आपकी लाइफ़ या ये दुनिया.

खिलखिलाते हुए गुजरिए.


इमेज सोर्स: गूगल













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