Sep 2, 2019

फ़िर चाहे आप की उम्र कितनी भी क्यों ना हो.






जो बच्चे सिखा दें तो कितना कमाल हो.
और बड़े सीख लें तो क्या मस्त धमाल हो.

एक्चुअली कई दफ़ा ऐसा हो जाता है कि
आप दूसरों को सही तरीके से समझे बिना ही
उनके बारे में अपनी फाइनल ओपिनियन 
बना डालते हैं.
और अचानक आपके संबंधों को
जंग लगने की परमिशन देने लगते हैं.

इसका ईलाज भी आप ही के पास है.
इसीलिए अपने हर संबंध को अच्छे से समझें
और उसे थोड़ा वक़्त ज़रूर दें.

कितना भी सुंदर फूल हो,
बिना पानी डाले तो, वो मुरझा ही जायेगा ना.

आप अपने संबंधों को खिलखिलाते रखना चाहते हैं
या दुःख भरे सपने जैसा देखते हैं,
ये आपके एक्शन पर डिपेंड करता है.
कोई और इसका ज़िम्मेदार नहीं?

एक बार की बात है,
एक 5 साल की छोटी बच्ची अपनी मां 
के साथ एक गार्डन में टहल रही थी.
बच्ची के हाथों में 2 सेब थे.
मां ने बच्ची से पूछा – मुझे भूख लगी है.
क्या तुम मुझे इन 2 सेबों में से मुझे 1 दे सकती हो?

मां की ये बात सुनकर बच्ची चुपचाप सी हो गई.
फिर अचानक उसने जल्दी से पहले सेब का
एक हिस्सा अपने दांतों से चबा डाला.
फिर दूसरे सेब का एक हिस्सा भी
अपने दांतों से काट लिया.

बच्ची को ऐसा करते देख मां थोड़ी मायूस हो गई.
उसे लगा कि उसकी बेटी में शेयर करके
खाने की आदत ही नहीं है.
जब वो अपनी मां को ही अपनी चीज़ नहीं
देना चाह रही,
तो फिर दूसरों की कभी क्या हेल्प कर सकेगी?

मां मायूस होकर भी मुस्कुराती रही
ताकि बच्ची को कुछ फ़ील ना हो.

तभी अचानक बच्ची ने उन 2 सेबों में से
1 सेब अपनी मां की तरफ़ बढ़ाया और कहा –
मम्मी, आप ये वाला सेब खाओ
क्योंकि ये ज्यादा मीठा है.

बच्ची की ये बात सुनकर मां हैरान रह गई.
उसे अपनी सोच पर पछतावा होने लगा.
वो सोचने लगी कि, मेरी बेटी तो मुझसे भी
ज्यादा केयरिंग है,
मेरे लिए कौन सा सेब ज्यादा मीठा रहेगा,
उसने तो ये सोचकर दोनों सेब का स्वाद लिया
और मैं तो ना जाने क्या क्या सोच बैठी.

अब दोनों मां – बेटी मुस्कुराते हुए घर की तरफ़ 
निकल गए.

तो बस ये ही है कि
हमेशा ख़ुद को ही सही मानते हुए दूसरों को
ग़लत समझ लेना बड़ा आसान है
मगर ये ओपिनियन हमेशा सही ही निकले,
ये आपकी बड़ी ग़लतफ़हमी भी हो सकती है
फ़िर चाहे आप की उम्र कितनी भी क्यों ना हो.

कभी – कभी जो दिखाई देता है,
वो सच ही हो, ऐसा भी नहीं है.

ये ही ध्यान देने की बात है.
आप दें सकें तो ध्यान दीजिए.


इमेज एंड स्टोरी सोर्स: गूगल


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