Sep 4, 2019

आप ना होते तो, शायद ही कुछ होता.





जीरो फ़ीस एंट्री हुई.
मैं किसी को नहीं जानता था
और ना ही कोई मुझे.

मैं जब इस धरा पर उतारा गया,
तो किसी भी चीज़ से अंजान था.
आने के लॉजिक से पूरी तरह अनभिज्ञ.

फ़िर कुछ लोग मिलने शुरू हुए.
सबको अलग-अलग टैग मिले हुए थे.
रिलेशन टैग, फ्रेंड्स टैग, यहां टैग, वहां टैग.
टैग ही टैग. 
बड़े का, छोटे का, पतले का, मोटे का.
इधर का, उधर का, ऊपर का, नीचे का.
जात का, पात का, औकात का, ज़ज्बात का.

सबका व्यवहार भी अलग-अलग और 
सोचने का तरीका भी.
सबकी मुस्कराहट के मायने भी अलग.
कोई एक बात से ख़ुश तो दूसरा उसी बात से दुखी.

शुरू में, कोई भी चीज़ कॉमन सी नहीं दिखी.
ये दुनिया कुछ अलग सी ही थी.

बाप रे.
इतने बड़े लेवल पर एंट्री के बाद भी यहां
अस्तित्व बचाने की कोशिशें बेहद आम थी.

ऊपर से सबकुछ सामान्य दिखता,
लेकिन अंदर से मानों सभी, 
किसी युद्ध की तैयारी में जुटे हों.

उनको ये कह कर मनाना कतई आसान नहीं था
कि लाइफ़ मिलने का मतलब है,
आपको एक टीम में स्थान मिलना
और आपका सिर्फ़ अच्छा खेलना ज़रूरी था,
इससे अधिक कुछ नहीं.

किसी को भी अपने दिमाग में ढ़ेरों लॉजिक का कचरा
डालने की कभी ज़रूरत होती ही नहीं.
मगर “ख़ाली दिमाग, शैतान का घर”
जैसे डायलाग ने लोगों को क्रिएटिव तरीके से 
सोचना बंद करवा दिया.
और नतीज़ा ये कि अब दुनिया में 
उन्माद और बैचनी कहीं अधिक है,
क्योंकि जितने लोग, उतने लॉजिक वाला फ़ॉर्मूला
किसी को सही तरीके से सोचने की और 
ले जा ही नहीं सकता.


मैं बारीकी से सबकी गतिविधियां देखता, 
डायरी में लिखता और पाता कि 
वो जैसा बोलते हैं, वैसा करते क्यों नहीं?
या जैसा करते हैं, वैसा बोलते क्यों नहीं?

सबकुछ रिवर्स.
उल्टे पैदा होने का ये ही नुकसान है कि 
सबकुछ उल्टा ही दिखाई दिखाई देता है.
फ़ायदा ये है कि वो सच दिखने लगता है, 
जो कभी कहा ही नहीं जाता.


ये पता लगाना अब आसान था कि
मनुष्य सबसे ज्यादा ख़ुशी या दुःख 
कब और क्यों महसूस करता है?
ये जानकर मुझे बड़ी राहत मिली कि 
हर कोई, एक स्टेज पर
अपनी आज़ादी को सबसे ज्यादा प्यार करता है.

इस बाहरी दुनिया से अलग, 
हर किसी के अंदर भी अपनी एक छोटी दुनिया है,
जो किसी भी टैग से परे अपने-आप 
ही मुस्कुराना जानती है.
ये उन लॉजिक से थोड़ा अलग हट कर 
सोचने की एक्सरसाइज थी,
जिससे मुझे ये जानने में मदद मिली कि
ख़ुश रहने के लिए आपको केवल 
संतुलन बनाने की कवायद से झूझना है
और एक बार ये बात किसी की समझ में 
आना शुरू हो जाए तो
वो हर जगह को ही स्वर्ग बना सकता है.  

मैं इसी कॉमन ख़ुशी की तलाश में था.
एक ऐसा जीवन, जिसमें बिना किसी गंभीर 
लॉजिक का एनालिसिस करे,
सभी के लिए मुस्कुराने की अपार वजहें निकल आएं.


आज भी किसी ख़ास लॉजिक की ज़रूरत 
महसूस नहीं होती,
सिवाय इसके कि ये चंद पलों का 
कोई खूबसूरत सफ़र है,
जिसमें अलग-अलग रंगों के लोग हैं, 
फीलिंग्स हैं, माइंड-सेट है, 
अलग-अलग फ्रीक्वेंसी है, बैंड-विड्थ है.

ये यक़ीनन रोचक है.
आज टीचर्स डे है.
और मैं सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज के गुरुओं का 
ही आभारी नहीं हूं,
मैं उन सभी का भी आभारी हूं,
जिन्होंने जाने-अनजाने जिंदगी के उन 
पहलुओं से भी रूबरू होने में मेरी मदद की,
जिन्हें अक्सर सामान्य मान कर मैं, 
अनदेखा भी कर सकता था.
लाइफ़ का असली फ्लेवर तो वो ही है.

बचपन से आज तक लोगों के व्यवहार करने के 
तरीके ने मुझे ये एहसास कराया है
कि असल जिंदगी में किस चीज़ के 
सबसे ज्यादा मायने होते हैं,
और क्या चीज़ आपके ऊपर सबसे ज्यादा 
असर छोड़ती है.

निश्चल प्रेम की बूंदे सबसे महंगा तोहफ़ा है,
जो कोई किसी को दे सके
और इससे अनमोल मुझे तो,
अभी तक कुछ मिला नहीं.

जीरो एग्जिट से पहले का ये सफ़र
आप सभी का आभारी है.
आप ना होते तो शायद ही कुछ होता.

इसीलिए हमें अच्छे टीचर्स और लाइफ़ मेंटोर्स 
की हमेशा ही ज़रूरत है.
उनके हमेशा साथ की तो और भी कहीं ज्यादा.

इससे लाइफ़ में जीवन आ जाता है.

और क्या मकसद होते हैं?



इमेज सोर्स: गूगल






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