Sep 9, 2019

जैसे उन्होंने कुछ भी ना खोया हो.





वो हमारे पड़ोस में ही रहते हैं.
लगभग 5-“8” की हाइट वाले अंकल जी.

जब भी मिलते हैं,
“और सरकार, क्या हाल हैं”,
ऐसा कहकर बात शुरू करते हैं.

चेहरे पर शिकन का कोई निशान नहीं.
जैसे उन्होंने कुछ भी ना खोया हो.
पत्नी नहीं है.
एक बेटा है, एनसीआर में कहीं रहता है.
वो अकेले हैं.

मगर,
मुस्कान के साथ ऐसा स्वागत करते हैं,
जैसे गर्मागर्म आलू का परांठा.

हर सुबह टहलना उनकी आदत का प्रमुख हिस्सा है.
दूध की डोली लेकर पास के गांव से 
ताज़ा दूध लेकर आना,
उनका पसंदीदा रिटायरमेंट प्लान होता है.

अपने सारे काम वो ख़ुद ही करते हैं.

मैं नहीं जानता कि
वो क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे?
लेकिन उनकी मुस्कराहट देख कर लगता है 
जैसे तृप्ति दी है उन्हें इस जिंदगी ने.

एक दिन उत्सुकतावश, मैंने पूछ ही लिया –
सर, आप इतना ख़ुश रहते हैं,
ये देखकर अच्छा लगता है.

उनका ज़वाब भी शानदार रहा.
बोले – मेरे पास इससे बेहतर आप्शन है ही नहीं.
दुखी होने के लिए कुछ पास में तो होना चाहिए.
जिंदगी की सारी उड़ानें उड़ कर देख ली हैं.

बहुत कम लोगों से निकटता बची है.
और इसीलिए चाहता हूं
कि जब तक क्रीज़ पर हूं,
जिंदगी की हर बॉल को खूबसूरती से प्लेस करूं.

ख़ुश रहने को मैंने अपना स्वभाव ही बना डाला है.
ये मेरी ही चॉइस है.
और ये मुझे हल्का रखती है.


सचमुच, 
कमाल है जिंदगी.
लोगों ने अकेलेपन से लड़ने के 
अचूक उपाय ख़ोज डाले हैं.

पुरानी यूनाइटेड फैमिलीज़ से
सिंगल फैमिली का सफ़र करने की मज़बूरी
और फ़िर एक दिन सिंगल ही रह जाने का सच.

नयी पीढ़ी को तो शायद ही कभी पता चले
कि ये बदलाव क्या असर डालता होगा?
वो तो स्टार्टिंग से ही अकेले चल रहे हैं.

उनके पास देने के लिए शायद ही कुछ बचे?
क्योंकि मिलकर रहने और बांटकर खाने
की परंपरा वाला युग
अब ढ़लान पर है.
अपना पूरा करने की एक्सरसाइज ही 
उन्हें तोड़े हुए है.

लेकिन कुछ पुराने बल्ब
अब भी ख़ुशी के साथ टिमटिमा रहे हैं.
फ्यूज होने से पहले, उनकी आख़िरी मुस्कान
भी, कितनी कीमती है.

ये मुझे तब समझ आता है,
जब कोई
“और सरकार, क्या हाल हैं” -
ये कहकर बुलाता है.

इमेज सोर्स: गूगल



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