Oct 29, 2019

तुम्हें रोशनी पसंद है और रोशनी को तुम.





तुम दीवाली मनाते हो.
दीये जलाते हो.
पटाखे छुटाते हो.
मिठाई घर लाते हो.
हैप्पी दीवाली कहने के लिए अपनों के पास जाते हो.
या उन्हें मोबाइल की मदद से अपने पास पाते हो.

जो करीब रहते हैं, उन्हें मुस्कुराहट के लड्डू खिलाते हो.
जो दूर हैं, उन्हें याद करते हुए मुस्कुराते हो.
जो हमेशा के लिए जा चुकें हैं, 
उन्हें नम आँखों से मनाते हो.
जो आने वाले हैं, 
उनका बेसब्री से इंतजार करने लगते हो.

तुलसी के पौधे में श्रद्धा का दीपक जलाते हो.
पूजा के दौरान लक्ष्मी जी से खूब पैसे और
गणेश जी से खूब सेहत की डिमांड भी करते चलते हो.

श्रीराम और उनकी वर्षों की यात्रा, उनके चरित्र,
उनके मैनेजमेंट के तरीके और
माता सीता के साथ उनके अद्भुत प्रेम को
महसूस करने का समय भी निकाल लेते हो.

उसके बाद टेक्निकल पॉइंट पर आते हो.
विश्वकर्मा डे भी शान से मनाते हो.
अगले दिन भाई-बहन के प्यार से जुड़ा
भैया-दूज का त्यौहार भी आता है
और दिल को एक सुकून सा मिलता जाता है.

अब छुट्टियां ख़त्म होने को हैं.
जिंदगी फ़िर से रूटीन वाले 
टाइम-टेबल की और इशारा करने लगी है.
अगले दिन तुम फ़िर से टिफ़िन उठाते हो.
दोबारा लाइफ़ के नाटक में अपने 
पात्र का किरदार निभाते हो,
थके-हारे शाम को घर लौट आते हो.
और फ़िर उसी हिसाब-किताब के फेर में 
उलझ जाते हो.

कुछ दिनों बाद नया साल आता है.
पुराना बीत जाता है.

जीवन इसी तरह आगे बढ़ता रहता है.
कुछ नया मिलता है,
कुछ पुराना छूट जाता है.

अगर कुछ अटपटा ना घटे
तो 60 – 70 सालों तक
लाइफ़ का दीया जगमगाता रहता है
रोशनी की रफ़्तार फ़ास्ट-स्लो, 
स्लो-फ़ास्ट होती रहती हैं.
और एक दिन तुम फ़िर से नए हो जाते हो.

तुम्हें दीवाली की ज़रूरत है और
दीवाली को तुम्हारी.
दोनों जगमगाना चाहते हैं.
साल में एक बार ही सही.

तुम्हें मीठा पसंद है
और मिठाई को तुम.
तुम्हें रोशनी पसंद है
और रोशनी को तुम.

ये लेन-देन अनूठा है
और इसीलिए शायद त्यौहार बनाए गए होंगे
ताकि ये झलक मिल सके कि
आदमी की पसंद क्या है?
क्योंकि जिंदगी बड़ी ही हसीन है,
बीत जाने से पहले.

तुम दीये जलाते चलना.
मुस्कुराते हुए बीतना.



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Oct 22, 2019

अपने बर्थडे पर बुलाना मत भूलना.




अगर तुम कोई भी तुलना ना करो.
किसी से, किसी की भी, 
किसी भी तरह की तुलना.
अगर ये बात अपने दिमाग में 
दही की तरह जमा सको.
और इसे अपने आसपास के लोगों के बीच 
रहते हुए
प्रैक्टिकल करते हुए
विचारों को आते और जाते हुए देख सको
और थोड़ा सा डिस्टेंस, सभी प्रकार के 
तर्कों से बना पाओ,
तो फ़िर तुम्हारे लिए कोई फेलियर नहीं रहेगा.
फ़िर तुम्हारे लिए कोई सक्सेस भी नहीं रहेगी.
केवल तुम रह सकोगे.
आराम से
जीवित से
रियल और सफाईदार.

ये ठीक वैसा ही प्रोसेस है,
जैसे घर के बर्तन साफ़ करना या कपड़े धोना.

तुम बस ख़ुद को धो सको
ताकि ख़ुद की सफ़ाई हो जाए.
बस इतनी सफ़ाई कि
जब भी तुम्हारी कोई ज़रूरत किसी को आन पड़े
तो तुम बिना मैले हुए उसके काम आ सको.
बिना किसी ओपिनियन का सहारा 
लेकर ख़ुद खड़े हो सको.
तुम्हें कोई परवाह ही ना करनी पड़े
और दूसरे तुम्हें देखकर ख़ुद भी 
चमकने की चाहत रह सकें,
इतना ही जिंदगी तुमसे उम्मीद करती है.

और जैसे ही तुम ये समझने का रिस्क 
उठा लेते हो तो
अस्तित्व ख़ुद तुम्हारे पैरों को छू कर 
नमस्कार करता है.

बस, जिस दिन तुम्हारे अंतर्मन के 
दाग, धुलकर साफ़ होंगे.
तुम तुलना के कष्ट से मुक्ति पाओगे
और फ़िर कोई पराया ना होगा.
सब तुम्हारा होगा.

तुम उसी दिन अपना बर्थडे मनाना.
बाकी दिन तो बीतने के दिन हैं.
वो ही दिन होगा,
जब तुम नहीं बितोगे.
उस दिन से रगड़ाई शुरू होगी
और तुम निखरने लगोगे.
तुम्हारे भीतर कुछ नया होगा.
जिंदगी अंगड़ाई लेगी
और उसे किसी भी बाहरी अप्रूवल की 
तुलना से आज़ादी मिलेगी.

अगर तुम बस इतना सा चाह सको
तो असल खज़ाने के दरवाजे, 
तुम्हारे लिए खुल गए समझो.

अपने बर्थडे पर बुलाना मत भूलना.

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