Dec 28, 2019

बस यहीं, कहानी अपना अंत बदल लेती है. हैप्पी न्यू ईयर.





कुछ चीज़ें भौतिक होती हैं.
कुछ साइंटिफिक, कुछ आर्थिक,
कुछ सामाजिक और कुछ यूं ही.

सिवाय हमारे,
इस कोसमोस में हर चीज़ परफेक्ट 
तरीके से रोटेट करती है,
बिना किसी तू – तू, मैं - मैं के.

हमनें डार्विन से जाना है कि
हम बंदरों और चिंपाजी के एडवांस्ड वर्शन हैं
और इसीलिए थोड़े से चनों, केलों और
कुछ दूसरी चीज़ों के लिए
हम उतावले रहते हुए, 
एक दूसरे से टकराते रहते हैं.

गर किसी ने हमें कुछ नहीं बताया होता 
तो शायद
हम यहाँ बहुत बेहतरीन परफॉरमेंस 
करके निपट सकते थे,
क्योंकि वो अनुभव हमारा प्रैक्टिकल 
एक्सपीरियंस काउंट होता,
लेकिन अब हमनें इतना ज्ञान, 
विज्ञान और सम्मान अपने अंदर भर लिया है
कि सीधी-साधी कोई बात समझने के लिए 
हमें, माइंड को उल्टी करानी पड़ती है
ताकि हम कुछ नया और 
सार्थक पैकेज अपने भीतर डाल सकें.

माने ये कि, हमारे सॉफ्टवेयर में हमनें 
इतने एंटीबायोटिक डाल लिए हैं कि
नई कोडिंग के लिए स्पेस ही नहीं निकल पा रहा.
पुरानी कमांड्स और इंस्ट्रक्शन मैन्युअल 
का सहारा लेते - लेते हम
अपने सॉफ्टवेयर को अपडेट करने से चूक जाते हैं.
बस यहीं, कहानी अपना अंत बदल लेती है.

कुछ ही घंटो बाद
नया साल हमारे आस - पास मंडराने लगेगा.
हमारे बाहर बहुत कुछ नया घटित होने लगेगा,
चीज़ें बदलना शुरू होंगी.
पुराना सभी विदा होगा.

हैरानी और आश्चर्य की लिमिट बढ़ा कर हम,
आने वाले इस साल के प्रति आभारी हो सकते हैं,
बशर्ते हम अपने अंदर के सॉफ्टवेयर को 
कुछ क्लीन कर सकें
ताकि उसमें कुछ नया और अनोखी कोडिंग 
करने की प्रोबेबिलिटी बनी रह सके.

करोड़ों वर्षो के एफर्ट के बाद इंसान के पास,
इस तरह का शानदार माइंड विकसित हुआ है
कि वो बिना बोले और बिना कहे ही दूसरों की
बात समझने का जादुई प्रयास कर सके.
पहले ऐसे पलों को चमत्कार कहा जाता था.

अब हम चमत्कारिक माइंड जनरेशन की तरफ़ हैं.
और आज की टेक्नोलॉजी ने इसे और 
पावरफुल बना दिया है.

आप चाहें तो अपने पूर्वजों
और आने वाली पुश्तों के लिए एक 
औरा बना कर जा सकते हैं.
और इसके लिए आपको अपने सॉफ्टवेयर में कुछ अच्छे टूल्स डालने ही चाहिएं.

नए साल पर ह्यूमैनिटी के लिए,
अब आप एक अच्छा और उपजाऊ गिफ्ट होंगे.
बंदरों और चिंपाजी को भी आप पर 
गर्व होना ही चाहिए.

हमें उन्हें अपने कर्मों से शर्मिंदा कर,
डूब-मरने के लिए नहीं छोड़ना चाहिए.

इस नए साल पर हमारी ये कोशिश 
होनी ही चाहिए
ताकि हम डार्विन की थ्योरी को अच्छे रिजल्ट से
सम्मानित करा सकें
वरना
किसी दूसरे से मिला ये अनमोल जीवन
60 – 70 सालों में,
कुछ चीज़ों में उलझकर ही दम तोड़ जाएगा.
और उसके बाद,
हमारे आने के आयाम हवा में भटकते रहेंगे,
इन्हें ही भूत कहते हैं.

भूत होने की बजाय मुक्ति पाना 
एक शानदार घटना है.
नए साल पर अपने पुराने भूतों से मुक्ति पाएं.
ये ही कामना है.

हैप्पी न्यू ईयर. 


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Dec 18, 2019

ठंड के मौसम में, आपका माइंड, आपसे क्या कहता है?





इन दिनों ठंड का जलवा है.
पिछले एक सप्ताह से तो उसने 
तूफ़ान मचाया हुआ है.
तूफ़ानी ठंडा.

ठंड इन दिनों अपने दोस्तों को 
इनवाइट करती है
और
कहती है कि आज कुछ तूफ़ानी करते हैं.
और वो ऐसा करती है.

भारत में हर मौसम, एक अलग 
वाइब्रेशन के साथ डांस कराता है.
गर्मियों में सूरज, गुस्से से लाल नज़र आता है
तो वहीँ ठंड में, किसी छोटे बच्चे के लाल टमाटर जैसे गालों की
तरह, गरिमामय उपस्थिति दर्ज़ कराता है.

हालांकि सूरज, पूरे साल एक ही 
स्वभाव में ही रहता है,
किसी से कुछ कहता नहीं, 
किसी का कुछ छीनता नहीं,
वो सबको इक्वल एनर्जी और 
गर्माहट से नवाजता है.
हां, ठंड में उसके लिए सम्मान की 
भावना थोड़ी और गहरी हो जाती है.

शुक्र है कि भारत की नेचर परिवर्तनशील है,
वर्ना अगर एक जैसा ही मौसम, पूरे साल बना रहे
तो ये निहायत ही बोरिंग और मायूस 
कर देने वाला अनुभव हो सकता था.

ठंड के और भी कई ज्यादा फ़ायदे हैं.
अगर, आप कभी गौर करें तो देखेंगे कि
ठंड के मौसम में आपका माइंड, 
किसी और मौसम के मुकाबले 
ज्यादा शांत होने लगता है.
विचारों और इमोशन की मात्रा भी 
बहुत कम हो जाती है.
खून कम उबाल मारता है.

सामाजिक नाटक करते रहने से 
थोड़ी आज़ादी महसूस की जा सकती है.
हर तरह के रिलेशन में प्यार की खुश्बू 
ज्यादा बनी रहती है,
क्योंकि ठंड की वजह से बातें करना 
कम हो जाता है
और झिक-झिक करने की वजहें 
अपने आप नीचे बैठने लगती हैं.
करियर या फ्यूचर का डर भी 
किसी आम मौसम के मुकाबले बहुत 
कम हो जाता है.
हीटर जला के या चूल्हा जला के गर्माहट लेना अधिक इम्पोर्टेन्ट नज़र आता है.

बेवजह के टोटके या ड्रामें ठंड में जलकर 
राख हो जाते हैं,
क्योंकि ठंड सबको एक जैसी ही लगती है.

हां, ठंड अगर थोड़ी पक्षपाती होती तो
कोई ना कोई उस पर भी केस ठोक सकता था,
लेकिन प्रकृति और अस्तित्व हमसे 
बहुत ज्यादा जागरूक और समझदार हैं.

कुछ महान चीज़ें
जैसे कि सही वातावरण बनाना,
जीव को कहाँ और किस तरीके से पैदा करना,
उसको एक अद्भुत तरीके से मुक्ति देना,
साथ ही साथ बॉडी सेल्स में आनंद की 
एनर्जी देना – ये कुछ ऐसी नियामतें हैं
जो बाय डिफ़ॉल्ट हर जीव को फ्री दी जाती हैं.
वो बात अलग है कि हर कोई अपनी 
समझदारी लगा-लगा कर अपनी
साइकोलॉजिकल मुसीबतें बढ़ाता रहे,
इसका कहीं कोई इलाज़ नहीं है.

ठंड का शरीर पर पड़ रहा प्रभाव,
ये बताने के लिए काफ़ी है
कि कौन कितना बड़ा है.

फ़िर भी, चिम्पांजी के बाद आने वाली 
कुछ नस्लें
ये साबित करने में जुटी रहती हैं
कि हमसें बेहतर कोई नहीं.

यहीं ठंड एक दिन, उन्हें जमा देती है.


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Dec 17, 2019

लातों के भूत बातों से नहीं मानते.





हर जीवन अपने भीतर
सुखी और स्वस्थ रहना ही चाहता है.

लेकिन पूरी सावधानी रखने के बाद भी
आप कब और किस वजह से बीमार पड़ जायें,
कई बार इसका जवाब, 
बड़े-बड़े डॉक्टर्स के पास
मिलना भी मुश्किल है.

कभी आप शारीरिक रूप से बीमार पड़ते हैं
तो तीन तरह के ट्रीटमेंट बड़े पोपुलर हैं.
सबसे तेज एलोपैथिक इलाज़,
लेकिन उतने ही तेज उसके 
बाद के साइड-इफेक्ट्स.

थोड़ा धीमा होम्योपैथिक इलाज़ और
उसके बाद आयुर्वेदिक इलाज़.
हालांकि ये दोनों साइड-इफेक्ट्स से दूर रखते हैं
लेकिन बीमारी के वजन के हिसाब 
से असर करने में लम्बा समय लगाते हैं.
ये जड़ पर काम करते हैं
और परमानेंट समाधान तलाशती हैं.
इसके लिए बहुत पेशेंस और 
यकीं चाहिए होता है.

बट,
आज की जनरेशन सबकुछ जल्दी चाहती है
तो एलोपैथिक बिज़नेस सबसे बड़ा है.
हाँ, बीमारी अगर अति गंभीर है
तो ऑपरेशन या सर्जरी या फ़िर 
अंतिम विदाई की
संभावना ही सबसे कॉमन रिजल्ट है.

लेकिन लोग भूल जाते हैं
कि अधिकतर बीमारियों का बेस 
मेंटल एनर्जी से कनेक्टेड है.

और अगर आप मेंटली तौर पर 
सिर्फ़ एक ही तरीके के चीज़ों
को साइक्लिक आर्डर में सुबह-शाम 
तक घुमाते रहते हैं
तो किसी भी बीमारी के आसार 
जल्दी होने का डर बना रहेगा
वर्ना
शरीर, अस्तित्व का ऐसा गिफ्ट है,
जो जल्दी से हार नहीं मानता
जब तक कि अति ना हो जाए,
कम से कम किस्मत के किसी रोल से पहले तक.

आपके जीवन में टेक्नोलॉजी के 
आने के बाद बीमारियों
का आना कम होना चाहिए था क्योंकि
जागरूक रहने का ये एक 
शानदार हथियार बन सकता था,
लेकिन उल्टा होने लगा है.
आप इसके गुलाम ही बन गए.
बजाय के कमांड अपने हाथ में रखने के
आपने उसे ही सबकुछ मान लिया.

रिजल्ट आपके सामने हैं.
आपके बच्चे, आस-पास के बच्चे,
ख़ुद आपका स्वभाव, 
आपके आस-पास का स्वभाव,
आपके रिलेशन, आपके यकीं, 
आपकी यादों के पैटर्न
सबकुछ बदल गए हैं.

हाथों से लिखना, लगभग आउटडेटिड हो गया है.
बिना चश्मों के, बच्चे कम ही नज़र आते हैं.
पैदल चलने की परंपरा दम तोड़ रही है.
तगड़े-तगड़े, गज़ब के मोबाइल सबके पास हैं
लेकिन, आपकी आवाज़ सुनने का झंझट
कोई नहीं लेना चाहता.

पहले ऐसा नहीं था.
जिस टेक्नोलॉजी से क्रान्ति हो सकती थी,
उससे आपने सिर्फ़ भ्रान्ति ही पैदा की है.

बीमार होना तो तय है.
कितने ही देश बीमार पड़े हैं.
उनके अंदर के मुद्दे ही नहीं सुलझते
तो वो बाहर की दुनिया को क्या अच्छा दे सकेंगे?
इसमें संदेह है.

कभी-कभी पुरानी कहावतें बिलकुल 
फिट होती दिखाई देती हैं.

दादी-नानी बताया करती कि
लातों के भूत बातों से नहीं मानते.

आजकल कहीं भी नज़र दौड़ाओ,
सबको कोई ना कोई भूत चढ़ा ही हुआ है.


कोई और किसी का भूत उतारे या ना उतारे,
लेकिन अपने लिए, आप अपने सर पे चढ़ा
कोई भूत ज़रूर उतार लें.

समय रहते ये करना
आज नहीं तो कल,
आपको कई फायदों से नवाज सकता है

और
जीवन एक बड़ी संभावना है.
इसे कॉपी-पेस्ट से अलग हट के देखिए.
फ़िर ये आपके लिए जो भी लिखेगा,
सुंदर और ओरिजिनल लिखेगा.


इमेज सोर्स: गूगल