Dec 17, 2019

लातों के भूत बातों से नहीं मानते.





हर जीवन अपने भीतर
सुखी और स्वस्थ रहना ही चाहता है.

लेकिन पूरी सावधानी रखने के बाद भी
आप कब और किस वजह से बीमार पड़ जायें,
कई बार इसका जवाब, 
बड़े-बड़े डॉक्टर्स के पास
मिलना भी मुश्किल है.

कभी आप शारीरिक रूप से बीमार पड़ते हैं
तो तीन तरह के ट्रीटमेंट बड़े पोपुलर हैं.
सबसे तेज एलोपैथिक इलाज़,
लेकिन उतने ही तेज उसके 
बाद के साइड-इफेक्ट्स.

थोड़ा धीमा होम्योपैथिक इलाज़ और
उसके बाद आयुर्वेदिक इलाज़.
हालांकि ये दोनों साइड-इफेक्ट्स से दूर रखते हैं
लेकिन बीमारी के वजन के हिसाब 
से असर करने में लम्बा समय लगाते हैं.
ये जड़ पर काम करते हैं
और परमानेंट समाधान तलाशती हैं.
इसके लिए बहुत पेशेंस और 
यकीं चाहिए होता है.

बट,
आज की जनरेशन सबकुछ जल्दी चाहती है
तो एलोपैथिक बिज़नेस सबसे बड़ा है.
हाँ, बीमारी अगर अति गंभीर है
तो ऑपरेशन या सर्जरी या फ़िर 
अंतिम विदाई की
संभावना ही सबसे कॉमन रिजल्ट है.

लेकिन लोग भूल जाते हैं
कि अधिकतर बीमारियों का बेस 
मेंटल एनर्जी से कनेक्टेड है.

और अगर आप मेंटली तौर पर 
सिर्फ़ एक ही तरीके के चीज़ों
को साइक्लिक आर्डर में सुबह-शाम 
तक घुमाते रहते हैं
तो किसी भी बीमारी के आसार 
जल्दी होने का डर बना रहेगा
वर्ना
शरीर, अस्तित्व का ऐसा गिफ्ट है,
जो जल्दी से हार नहीं मानता
जब तक कि अति ना हो जाए,
कम से कम किस्मत के किसी रोल से पहले तक.

आपके जीवन में टेक्नोलॉजी के 
आने के बाद बीमारियों
का आना कम होना चाहिए था क्योंकि
जागरूक रहने का ये एक 
शानदार हथियार बन सकता था,
लेकिन उल्टा होने लगा है.
आप इसके गुलाम ही बन गए.
बजाय के कमांड अपने हाथ में रखने के
आपने उसे ही सबकुछ मान लिया.

रिजल्ट आपके सामने हैं.
आपके बच्चे, आस-पास के बच्चे,
ख़ुद आपका स्वभाव, 
आपके आस-पास का स्वभाव,
आपके रिलेशन, आपके यकीं, 
आपकी यादों के पैटर्न
सबकुछ बदल गए हैं.

हाथों से लिखना, लगभग आउटडेटिड हो गया है.
बिना चश्मों के, बच्चे कम ही नज़र आते हैं.
पैदल चलने की परंपरा दम तोड़ रही है.
तगड़े-तगड़े, गज़ब के मोबाइल सबके पास हैं
लेकिन, आपकी आवाज़ सुनने का झंझट
कोई नहीं लेना चाहता.

पहले ऐसा नहीं था.
जिस टेक्नोलॉजी से क्रान्ति हो सकती थी,
उससे आपने सिर्फ़ भ्रान्ति ही पैदा की है.

बीमार होना तो तय है.
कितने ही देश बीमार पड़े हैं.
उनके अंदर के मुद्दे ही नहीं सुलझते
तो वो बाहर की दुनिया को क्या अच्छा दे सकेंगे?
इसमें संदेह है.

कभी-कभी पुरानी कहावतें बिलकुल 
फिट होती दिखाई देती हैं.

दादी-नानी बताया करती कि
लातों के भूत बातों से नहीं मानते.

आजकल कहीं भी नज़र दौड़ाओ,
सबको कोई ना कोई भूत चढ़ा ही हुआ है.


कोई और किसी का भूत उतारे या ना उतारे,
लेकिन अपने लिए, आप अपने सर पे चढ़ा
कोई भूत ज़रूर उतार लें.

समय रहते ये करना
आज नहीं तो कल,
आपको कई फायदों से नवाज सकता है

और
जीवन एक बड़ी संभावना है.
इसे कॉपी-पेस्ट से अलग हट के देखिए.
फ़िर ये आपके लिए जो भी लिखेगा,
सुंदर और ओरिजिनल लिखेगा.


इमेज सोर्स: गूगल






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