Apr 20, 2019

19 साल बाद मुझे उसकी याद आयी. 45 दिनों बाद वो मिल ही गया.






दुनिया के सबसे धनवान लोगों में से एक बिल गेट्स से किसी ने पूछा –
क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है?

बिल गेट्स ने जवाब दिया - हां, एक व्यक्ति इस दुनिया में मुझसे भी अमीर है.
कौन ?

बिल गेट्स ने बताया –
एक समय मे जब मेरी प्रसिद्धि और अमीरी के दिन नहीं थे.
मैं न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर था.

वहां सुबह सुबह अखबार देख कर  मैंने एक अखबार खरीदना चाहा, पर मेरे पास खुल्ले पैसे नहीं थे.
इसीलिए मैंने अखबार लेने का विचार त्याग कर उसे वापस रख दिया.
अखबार बेचने वाले लड़के ने मुझे देखा  तो मैंने खुल्ले पैसे न होने की बात कही.
लड़के ने अखबार देते हुए कहा - यह मैं आपको मुफ्त में देता हूँ.


बात आई-गई हो गई.

करीब 3 महीने बाद संयोगवश उसी एयरपोर्ट पर मैं फिर उतरा और अखबार के लिए फिर मेरे पास खुल्ले पैसे या सिक्के नहीं थे.
उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया तो मैंने मना कर दिया.
मैं ये नहीं ले सकता – मैंने कहा.


उस लड़के ने कहा - आप इसे ले सकते हैं.
मैं इसे अपने प्रॉफिट के हिस्से से दे रहा हूँ. मुझे नुकसान नहीं होगा.
मैंने अखबार ले लिया.


लगभग 19 साल बाद अपने प्रसिद्ध हो जाने के बाद
एक दिन मुझे उस लड़के की याद आयी
और
मैंने उसे ढूंढना शुरू किया.


कोई 45 दिन खोजने के बाद आखिरकार वह मिल ही गया.
मैंने पूछा - क्या तुम मुझे पहचानते हो?  
लड़का - हां, आप मि. बिल गेट्स हैं.
गेट्स - तुम्हे याद है, कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे?
लड़का - जी हां, बिल्कुल. ऐसा दो बार हुआ था.


गेट्स- मैं तुम्हारे उस किये हुए की कीमत अदा करना चाहता हूँ.
तुम अपनी जिंदगी में जो कुछ चाहते हो, बताओ, मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा.


लड़का - सर,  लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि ऐसा कर के आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे.
गेट्स - क्यूं?


लड़का - मैंने जब आपकी मदद की थी,  मैं एक गरीब लड़का था, जो अखबार बेचता था.
और
आप मेरी मदद तब कर रहे हैं, जब आप इस दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्य वाले व्यक्ति हैं.

फिर, आप मेरी मदद की बराबरी कैसे करेंगे?


बिल गेट्स की नजर में, वह व्यक्ति दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति से भी अमीर था,
क्योंकि किसी की मदद करने के लिए उसने अमीर होने का इंतजार नहीं किया था.


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अमीरी पैसे से नहीं दिल से होती है.
क्या सचमुच आप अमीर हुए हैं
या सिर्फ़ बैंक बैलेंस ही बढ़ा है?
दोनों में बहुत फ़र्क है.
एक स्वर्ग, दूसरा नरक है.
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Apr 19, 2019

अभी मैं 55 में हूँ, फ़िर से बचपन में हूँ.





Humour at its Best @ 16 Fabulous.

Quote 1:  मेरे जीवन में आये सभी लोग शानदार थे. बस उनके कपड़े अलग-अलग थे.

Quote 2:  इतने विकास के बाद भी आदमी जल्दी क्यों मर रहा है. पक्का कोई है, जो हमारे विकास से बहुत डर रहा है.

Quote 3:  जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ती गई, मेरा ज्ञान कम होता गया. अभी मैं 55 में हूँ, फ़िर से बचपन में हूँ.

Quote 4:  मैंने तुम्हें बिना मिले ही पा लिया. मैंने तुम्हें भीतर से पुकारा. बस.

Quote 5:  पहले माँ दिखाई ज्यादा देती थी. अब महसूस ज्यादा होती हैं. कितना फ़र्क है ना?

Quote 6:  जब मैं होशियार था तो ख़ुश नहीं था. अब मैं ख़ुश हूँ तो होशियारी चली गई.

Quote 7:  तुम्हारे दुःख और सुख जो तुम्हारे बिना कुछ कहे ही पढ़ ले, कहीं तो तुम्हारा सीनियर ही रहा होगा.

Quote 8:  यूँ ही नहीं मिलती मुस्कुराने की वजह. सदियों तक रोने की रस्में अदा करनी पड़ती हैं.

Quote 9:  तुम मुझे बेवकूफ़ कह कर रिश्ता ख़राब नहीं करना चाहते, पर मैं तो इस सच्चाई को बचपन से जानता हूँ. फ्री रहो.

Quote 10:  सब ऊपर उठना चाहते हैं. ऊपर जाना कोई नहीं चाहता.

Quote 11:  मैंने भगवान् को नहीं देखा, तुम्हें देखा. यक़ीनन भगवान् शानदार ही होंगे.

Quote 12:  हम बाज़ार की खूबसूरती पर मर जाते हैं और अंदर के फूल दम तोड़ देते हैं.

Quote 13:  0 – 25 साल: कुछ बनना है. 25 – 60 साल: बन गए. 60 के बाद: जाना होगा. ख़ुद से कब मिले.

Quote 14:  जब तक मिलता नहीं, जिंदा हो तुम. मिलते ही मुर्दे.

Quote 15:  अगर आपको सबकुछ पता चल ही गया है तो अब यहाँ रह कर करोगे भी क्या?

Quote 16:  ईश्वर सबकी सुनते हैं. तुम 2 – 4 की भी नहीं सुन सकते. कहीं बहरे तो नहीं हो?


07.46 AM
19 April 2019
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Apr 18, 2019

आप हम से सीखिए. हम प्रैक्टिकल लोग हैं.




छात्र जीवन में
हम कम्युनिस्ट होते हैं,
नौकरी मिलते ही समाजवादी
और नौकरी पक्की होते ही अर्थशास्त्री.
इससे ऊपर हम नहीं जाते.
बस सीधे ऊपर जाते हैं.



भारत एक गज़ब देश है.
विदेश की हर चीज़ उसे पसंद ही आए,
ज़रूरी नहीं.

विदेशों में कहा जाता है
कि
जब आप मुस्कुराते हैं तो आपकी
आधी मुस्कान दूसरों के चेहरे पर आ जाती है.


यहाँ ऐसा नहीं है.
आप मुस्कुरा कर देखिए.
सामने वाला ज्यादा सीरियस हो उठेगा.
हो सकता है कि वो चिढ़ जाए
उसकी त्योरियां भी चढ़ सकती है.


आप इसे ऐसे समझने की कोशिश करें
चूँकि  
हमारा देश एक महान डाइवर्सिफाइड कंट्री है.
यहाँ वो भी संभव है, जो कहीं देखने को नहीं मिलता.
हम किसी की नहीं सुनते साहब.
बस हम सहीं हैं.


यहाँ थ्योरी और प्रैक्टिकल के अलग अलग मायने है.
आप नज़र घूमा कर देखिए.


जब पढ़ाई का समय हो तो बच्चों का मन कुछ और करने का करता है.
जब खेलने का समय हो तो हम उन्हें मोबाइल पकड़ा देते हैं.
जब करियर बनाने का समय हो तो 
पड़ोसी या अपना कोई परिचित सलाहकार हो जाता है.
जिसका करियर है, 
उससे चॉइस मांगने से इज्ज़त घटती है.


यहाँ कमाल की फिलोसोफी चलती हैं.
अधिकांश युवा धार्मिक स्थलों पर ईश्वर के अलावा कुछ और ही तलाश रहे होते हैं.



जिसका पेट पहले से ही भरा है,
उसे और खिलाया जाता है.
जिसका पेट ख़ाली है,
उसे धिक्कार की नज़र से देख पाने में हमें महारत हासिल है.


हम वहां गिफ्ट देना पसंद करते हैं,
जिनके पास पहले से कितने ही और महंगे गिफ्ट किसी कमरे में पड़े सड़ रहे हैं.
दिवाली पर आप इस नज़ारे को और करीब से महसूस कर सकेंगे.



हमने पढ़ तो लिया कि जरूरतमंद की मदद करनी चाहिए,
लेकिन जब किसी को जरुरत होती है,
बजाय उसका साथ देने के हम पीछे हट जाते हैं.
कौन पचड़े में पड़े?


हम किसी की इज्ज़त उसकी नीयत, प्रतिभा, ईमानदारी देख कर नहीं करते.
हम पागल थोड़े ही हैं.
इन चीज़ों में पैसे की खनक तो है ही नहीं.
हमें बस अपना काम निकालने से मतलब है.
काम ख़त्म. रिश्ते स्वाहा.


बड़ी गाड़ी, बंगला, बड़ी कार, सबकुछ बड़ा ही बड़ा,
इनके बिना हम सांस भी कैसे लें?

ऑक्सीजन बेचारी रोती फिरती है. 
पेड़ कहते हैं हमें लगाओ और आराम से सांस लो.
हम फ्री हेल्थ देंगे. पर ना जी.
हमें तो एयर फ़िल्टर लगाने है. वी आर डेवलप्ड, यू नो?


हमें गद्दारी भी बेहद पसंद है. आप इतिहास को पढ़िए.
हममें से ही कोई ऐसा निकलता है जो थोड़े से लालच के लिए हमें ही बिकवा देता है.
हम प्यार-प्यार चिल्लाते हैं, पर वो शरीर से आगे नहीं बढ़ पाता.


आप हम से सीखिए,
हम प्रैक्टिकल लोग हैं.
चाइना को गाली देंगे लेकिन जैसे ही वो हमें कोई सस्ता सामान देने की लोलीपोप देगा,
अपनी औकात दिखा देंगे.
हमें देश से क्या? उसकी चिंता हम क्यों करें? बाकी लोग हैं ना इस काम के लिए.


पडोसी देश हमारे जवानों को मारता रहे, हमें क्या?
उनकी ड्यूटी है भई. मेरे घर से तो कोई नहीं है इस फील्ड में. मुझे क्या?


इतनी शानदार सोच के साथ हिन्दुस्तानी को आगे ले जाया जा रहा है. कहाँ? ये किसी को ख़बर नहीं.


और अब तो 
डिजिटल क्रांति आ गयी है. 6-7 घंटे रोज का काम है हमारा.
इंटरनेट की स्पीड गज़ब है लेकिन हमें क्या देखना चाहिए ये किसी को नहीं पता.


हम भविष्य की प्लानिंग नहीं करते बल्कि
भविष्य के लिए प्लानिंग करते हैं.
और भविष्य सबके साथ होता है.
किसी एक का कोई भविष्य नहीं होता.
ये ही सीखने और सिखाने का समय है.
आपके पास टाइम है क्या?


आओ अपना बल्ब जलाएं.

सबके लिए रौशनी ले आएं.

07.06 AM
18 APRIL 2019
Image Source: Google

( ये लेखक के निजी विचार हैं और केवल हास्य - बोध के साथ चिंतन हो, उसके लिए प्रस्तुत किये गए हैं)

Apr 17, 2019

9 से 5 तक नौकर और 5 से 9 तक राजा.







नार्मल स्टडी पूरी करने के बाद
लगभग 20 – 25 साल की उम्र के बीच
आप नौकरी करना या दूसरों से सीखना स्टार्ट कर देते हैं.


ऱोज
आप 9 से 5 तक नौकरी करते हैं
और 5 से 9 तक राजा होते हैं
और छुट्टी वाले दिन पूरे 24 घंटे राजा
या पूरे 24 घंटे नौकर.


ये 1 दिन की फ़िल्म में
2 एक्टर का रोल प्ले करने जैसा है.
और दोनों ही रोल मायने रखते हैं.


इससे हमें लगभग ऱोज ही अपनी काबिलियत को तलाशने और तराशने
के मौके मिलते हैं
और 
हैसियत का एहसास भी ऱोज – ऱोज मुफ़्त में मिल जाता है.
नौकरी टाइम में राजा वाली फीलिंग लेना 
कष्टकारी हो सकता है.
ये सेल्फ़-अपडेट है.


यहाँ सबकुछ आधा-आधा ही मिलता है.
सुख आधा, दुःख भी आधा, 
ज़िम्मेदारी भी आधी ही.
क्योंकि आप किसी और की स्टेज पर अपनी परफॉरमेंस देते हैं,
ये किसी किराये के घर में रहने जैसा है
वो भी आधे दिन ही,
फ़िर चाहे वो प्राइवेट हो सरकारी.


ये रिलैक्स करता है और चिंतित भी
आपके हाथ में सिर्फ़ काम करके देना है.

आपका जैसा भी काम हो, वो बोलता है
और काफ़ी हद तक आपके बॉस के स्वभाव पर भी निर्भर करता है.

आपके आस-पास भी कई महान लोग होते हैं 
और
उनका रोल आपके किरदार को उठा भी सकता है 
और गिरा भी.


ऐसे में
आपके किरदार निभाने के ढंग से आपके सफ़र का अंदाजा लगाना रोचक होता है.
आप मुस्कुरा भी सकते हैं या अपना सर पिटते हुए भी ऱोज घर जा सकते हैं.


नौकर से राजा बनने का सफ़र हल्का है
लेकिन
राजा से नौकर बनने का सफ़र बेहद भारी.
आपके एडजस्ट करने के तरीके का यहाँ बहुत महत्व है.
दुनिया आपको नहीं चाह सकती, वो एडजस्टमेंट पसंद करती है.




जो 24 घंटे केवल राजा या केवल नौकर रहना पसंद करते हैं,
वो बिज़नेस में उतर जाते हैं
अब जो भी है, उनकी ज़िम्मेदारी है.
50 – 50 जैसा कुछ नहीं रहता.


ख़ुशी भी 100% तो दुःख भी उतना ही.
ये रिस्की भी है तो सम्मान दिलाने वाला भी.


इसमें शुरुआत ख़ुद करनी होती है
आप चल गए तो लोग तालियाँ पीटेंगे
और
गर पिट गए
तो आपकी तरफ देखते हुए उनकी आँखों में सूजन सी आ जाएगी.




जो 24 घंटे कोई भी भूमिका निभाना नहीं चाहते,
वो किसी सामाजिक विषय को चुन लेते हैं
और 
पूरी जिंदगी अलग-अलग वैरायटी आजमाते रहते हैं.
ये लोगों से मेलजोल में बेजोड़ होते हैं
और अपने दायरों से अपना एहसास कराना पसंद करते है.



तरह-तरह के इन्हीं मस्त किरदारों के साथ
ये पूरी साइकिल 55 – 65 साल तक चलती है
फ़िर आपको वापसी की तैयारी करनी होती है.
चाहे आपने कोई भी आप्शन चुना हो.


इसलिए
आप चाहें कैसे भी चलें
12-12 घंटे के हिसाब से
या 24 घंटे के तरीके से
या बिना समय के.


चाहे नाचते – गाते, मुस्कुराते 
या चीखते-चिल्लाते
या फ़िर 
अकेले या भीड़ में
अच्छे – बुरे, 
अमीर होकर या गरीब
नौकर बनकर, 
राजा बनकर 
या
कुछ भी और
जो आपको पसंद आए.


लेकिन
आपको अपनी यात्रा से
संतुष्ट होना बहुत ज़रूरी है
क्यों?


ताकि इस जीवन में
आपकी अंतिम साँस के बाद
जो आपका अगला सफ़र शुरू हो
वो तो कम से कम
गिले-शिकवों से आज़ाद रहे.

जाते-जाते ही सही
आपका इतना करना बनता भी है.

बिना कपड़ों के आने से लेकर
बिना कपड़ो के जाने तक
आपका
इतना तो बनता है कि
आप ख़ुश होकर जाएं.

है के नहीं?



06.58 AM

17 अप्रैल 2019

इमेज सोर्स: गूगल