Jan 30, 2020

नाम जो भी हो. है वायरस खतरनाक. बच के रहना रे बाबा.






जब भी कोई नई चीज़ आती है
तो इम्प्रेस करती है.
डरा भी सकती है
और अवेयर भी कर सकती है.

इन दिनों करॉना वायरस की धूम है.
कुछ ही दिनों में इसने पूरी दुनिया की
अटेंशन पा ली है.
वायरस ऐसा कि पल में, किसी को भी 
चित्त कर दे.

चूंकि हम साइलेंस को कम ही लाइक करते हैं
तो इसका “O” साइलेंट करे बिना इसे 
कोरोना नाम से भी
पोपुलर कर रहे हैं.
आप इसे किसी भी नाम से पुकारें
मगर अब तक इसने 200 लोगों से 
धरती को ख़ाली करवा दिया है.

ये वायरलेस मीडियम में भी अपना 
बेस बनाए रखता है
और छींक या जुकाम से भी दूसरों के 
दिल में जगह बना डालता है.

इसने अपने करियर की शुरुआत
इकॉनमी के लीजेंड माने जाने वाले 
चाइना से की है
और अब ये अपने वर्ल्ड-वाइड टूर पर है.
इससे डरना वाज़िब है पर
थोड़ा केयरफुल रह कर, आप इसे चुपचाप 
जाने दे सकते हैं.
इसके लिए आपको डॉक्टर्स की सलाह 
मान लेनी चाहिए.

जैसा कि अपडेट आ रहे हैं,
ये सांप या चमगादड़ जैसे जीवों या 
जानवरों से निकला हुआ प्रोडक्ट है.
ये इतना सेल्फ-डेवलपिंग है कि अगर 
किसी इंसान के भीतर चला जाए तो
आसानी से सर्वाइव कर लेता है. 
गज़ब का एडजस्टमेंट.

इसका एंटी-वायरस बनाना एक बड़ा 
चैलेंज है मेडिकल एक्सपर्ट्स के लिए.

चाइना में लोग, सांप और चमगादड़ जैसे 
जीवों को बड़े चाव से खाते हैं.
कहा जा रहा है कि ये वायरस 
इसी खान-पान की देन है.
ये ह्यूमन टू ह्यूमन ट्रेवल कर रहा है,
थ्रू सांस, हवा एंड नमी.
जो लोग  सी-फूड या कच्चा – अधपका मांस 
खाते हैं,
दे आर द मेन कम्युनिकेशन चैनल 
बिहाइंड द ग्रोथ ऑफ़ दिस फेनोमेना.

एनीवे,
इशू जब बढ़ जाता है
और टिश्यू पर अटैक कर देता है
तो आदमी घबराता है और उपाय तलाशता है.
कुछ ना कुछ अच्छा समाधान तो सामने 
आएगा ही.

प्रॉब्लम की नब्ज़ को एकबार पकड़ ली जाए
तो कम से कम दोबारा उससे लड़ना नहीं पड़ता.
आदमी वैसे भी अलर्ट ही रहता है.
बेवजह मरने की किसे जल्दी है?

इतने बड़े सोशल इशू में ये बात थोड़ा 
इंटरेस्ट पैदा करती है
कि आखिर इस वायरस का नाम 
करॉना क्यों पड़ा?
ये साइंटिफिक टच है.

सूर्य को जब ग्रहण लगता है
तो पृथ्वी सूर्य को पूरी तरह कवर कर लेती है 
और
गोले के रूप में सूरज दिखना बंद.
बट, उसकी रोशनी, किरणों के रूप में दीखती है.
जैसे सूरजमुखी के फूल की तरह का स्ट्रक्चर.
बीच से काला और 
इसके सर्किल के चारों तरफ लाइट.
इस लाइट का नाम है करॉना.

इसलिए इस वायरस का नाम करॉना 
दिया गया क्योंकि इसकी बनावट ऐसी ही है.

नाम जो भी हो.
है वायरस खतरनाक.
बच के रहना रे बाबा.

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A से B एंड सो ओन सो ओन.





जीवन रहस्यों की पगडंडी है.
जितना तुम आगे बढ़ोगे,
ये तुम्हें पीछे धकेलता रहेगा.
ये कहेगा तुमसे कि अभी तो 
कुछ हुआ ही नहीं है.
तुम थोड़ा और ज़ोर लगाओगे.
A से B एंड सो ओन सो ओन.

जब तुम Z तक पहुंचोगे,
कितने ही साल निकल चुके होंगे,
कितने ही रिश्तें बह चुके होंगे,
कितने ही लम्हें यादें बन चुके होंगे.

उस वक़्त तक तुम सबकुछ बन चुके होंगे,
सबकुछ पा चुके होंगे,
कितना कुछ पचा चुके होंगे.
सारा ज्ञान तुम में भर चुका होगा.
सारी इच्छाएं पूरी हो चुकी होंगी.
Z पर तो फाइनल स्पीच रह जाती है.

तुम चाहोगे कि लोग तुमसे,
तुम्हारे अनुभव पूछे,
कोई चांस नहीं.

तुम चाहोगे कि तुम्हारी उपलब्धियों पर 
लोग ताली मारें,
कोई चांस नहीं.
तुम चाहोगे कोई साथ खड़ा रहे 
मरते दम तक,
कोई चांस नहीं.
तुम चाहोगे कि जो कमाई की, 
उसका एन्जॉय कर लूँ,
बॉडी ऐसा कोई चांस नहीं देगी.

फ़िर तुम A की तरफ़ वापिस लौटना चाहोगे
लेकिन ये प्रैक्टिकल नहीं है.

फ़िर तुम चैक करोगे कि ये हुआ क्या?
जिस ख़्वाब से जन्नत की कल्पना की थी,
वैसा तो कुछ भी नहीं है.

और तब तुम,
अगर पहचान पाए कि
असली ख़्वाब कौन सा है
तो शायद कुछ फूल खिल सकें
तो शायद तुम्हारी सुई कहीं अटके
तो शायद कुछ क्लिक हो.
तो शायद जीवन धड़के.

अभी तो A टू Z का सफ़र है.
पूरा कर लो.
फ़िर अगर समय बचा तो चर्चा होगी.
क्योंकि
हर विज़न के साथ एक प्रोविजन होता है.
नो विज़न के साथ भी.
आफ्टर विज़न के साथ भी.


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Jan 28, 2020

करोड़पति तो लाखों हो सकते हैं, लेकिन पदमश्री सबको नहीं मिलता.





बड़े लोगों को कुछ बड़ा मिल जाए तो
कम हैरानी होती है
क्योंकि किसी ना किसी रास्ते से
उनका कनेक्शन फिट बैठ जाता है
और निशाना लग जाता है.
लेकिन अगर किसी छुपे हुए रुस्तम को 
कुछ बड़ा मिलता है तो फ़िर 
सबको ऐसा लगता है जैसे उन्हें ही मिला हो.

अभी पद्मश्री पुरस्कारों का अनाउंसमेंट हुआ है.
आप अगर गौर से देख सकें तो 
इन रेपुटेड पुरस्कारों में
आपको कुछ नाम ऐसे भी मिलेंगे
जिसे लेकर आपका अट्रैक्शन शायद 
ही कभी रहा हो.
लेकिन वो नाम और उनके 
काम वाकई इतने बेसिक और शानदार हैं
कि आप ख़ुशी के आंसुओं के साथ 
भीगने का मज़ा ले सकें.

ऐसे नाम जो टैलेंट से नहीं भरे हैं,
ऐसे नाम जो रेफेरेंस से नहीं बढ़े हैं,
ऐसे नाम जो सालों से ऐसे सपनों के साथ 
चले, जो उनके अपने लिए नहीं थे.

ऐसे ही एक शख्सियत हैं 
चंडीगढ़ के जगदीश लाल आहूजा.
लंगर बाबा के नाम से पोपुलर.
12 साल की उम्र में पेशावर से मानसा पहुंचे.
पटियाला में रेहड़ी लगानी स्टार्ट की.
फिर सिर्फ 4 रुपए 15 पैसे के साथ 
चंडीगढ़ शिफ्ट.
पिछले 39 साल से भूखे और 
जरूरतमंद लोगों को खाना खिला रहे हैं.

उनकी कहानी किसी फ़िल्मी कहानी से 
कहीं ज्यादा कलरफुल है.
भूखे मरने पर मजबूर एक 
व्यक्ति करोड़पति बनता है
और फ़िर अपनी दादी से मोटिवेशन 
लेकर इतिहास रच देना.

करोड़पति तो लाखों हो सकते हैं,
लेकिन पदमश्री सबको नहीं मिलता.

केलों के बिज़नेस से ऊंचाई तक जाना
और फ़िर लगभग 4 दशकों तक जरुरतमंदों को
दाल, रोटी, चावल और हलवा खिलाना
वो भी बिना किसी छुट्टी के.

उनकी वजह से PGI चंडीगढ़ का कोई 
मरीज रात में भूखा नहीं सोता.
कमाल है.

हर रात 500 से 600 व्यक्तियों का लंगर.
लंगर के दौरान आने वाले बच्चों को 
बिस्कुट और खिलौने भी.
मजबूरों का पेट भरने की लगन,
रोचक बात ये कि अपना सबकुछ बेचकर.

वो तो लंगर बाबा हैं ही,
उनकी धर्मपत्नी को भी सब सम्मान से 
“जय माता दी” कहकर बुलाते हैं.

आज कल के अजीबो-गरीब समाचारों के दौर में
मानवता से जुड़ी ऐसी खबरें आत्मा को
तसल्ली से भी कुछ ज्यादा 
आरामदायक फ़ील करा देती हैं.

अब समय है महान लोगों को पूजने का.

लंगर बाबा का ये जलवा हर सामान्य आदमी को
ये सोचने पर ज़रूर मजबूर करता है
कि महान होना ज्यादा बड़ी बात है 
या बड़ा बनना?

क्योंकि आप बड़े अपने लिए होते हैं
लेकिन महान किसी की सेवा करके ही
बना जा सकता है.

आज चंडीगढ़ मुस्कुरा रहा है.
उसके पास ख़ुश होने की धांसू वजह है.
वहां लंगर बाबा जैसे कमाल के लोग बसे हैं.
जीने का ढंग सिखा रहे हैं.
प्रैक्टिकल तरीका.
भारत में ऐसे कितने ही चंडीगढ़ है जो 
फूल खिला रहे हैं.

पद्मश्री मिलने पर लंगर बाबा और 
दूसरे महान लोगों को भी दिल से अभिनंदन.

यहाँ दिल, जीत जाता है.


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