Jan 14, 2020

जिन विचारों पर आपका ज्यादा फोकस है, वो ही आपका व्यक्तित्व है.





एक पूरे दिन में,
दिमाग में हज़ारों विचारों की एंट्री होती है.
फ़िर चीज़ें एग्जिट भी हो जाती हैं.

दिमाग एक कैलकुलेटर ही तो है
हां, ये एक शानदार ग्राफ़िक्स डिज़ाइनर भी है
जो ऑडियो भी चला लेता है, 
वीडियो भी और
फोटोग्राफर भी कमाल का है.
इसका डेटाबेस कितना है ये तो 
इसके क्रिएटर को ही पता होगा,
आदमी सिर्फ़ एस्टीमेट बना सकता है,
थोड़ा साइंटिफिक अंदाज़ा या इसके कुछ स्केच.

दिल का इससे गहरा रिलेशन है.
दिल गया तो इसकी भी पॉवर ऑफ.
लेकिन ये दिल की तरह एडजस्ट करने की 
तरह फ्लेक्सिबिलिटी से बचता है.
अड़ गया तो अड़ गया.
इसकी इसी ज़िद की वजह से कई बार 
आउटपुट बिगड़ भी जाता है.

दिमाग गरम खून को ज्यादा पसंद करता है
और इसी वजह से इसे गर्म रहना ज्यादा पसंद है.
दिल को नार्मल मूवमेंट पसंद है.
सही-ग़लत से ऊपर ये फीलिंग को 
प्रायोरिटी देता है.
दिमाग लॉजिक का जाल है. वेब ऑफ़ लॉजिक.
ये हर चीज़ को परखना चाहता है.
विश्वास कर लेना इसकी डिक्शनरी में नहीं आता.
इसे जो सही लगता है, वो ही सही है.
फ़िर चाहे दूसरे कितनी ही समझदार बातें बता दें,
लेकिन इसने किसी की नहीं माननी.

दिमाग राजा बाबू है.
ये तभी समझ सकता है जब 
इसकी तगड़ी पिटाई हो.
पिटाई मतलब कम से कम विचार.
ठीक विचार और फ़िर ठीक आउटपुट.

बस तभी ये भीगी बिल्ली बन कर 
शांत बैठ सकता है,
वरना इसकी बक-बक मरते दम 
तक पूरी नहीं होती.

वैसे तो दिमाग का गुमसुम हो जाना ठीक नहीं,
लेकिन अगर आप चाहते हैं कि ये 
मस्त भी रहे और
कम स्ट्रेस या परेशानी ही पैदा करे
तो इसके लिए आपको एक काम 
ज़रूर करना चाहिए.
सही इनपुट देने का डोज़.

इसे ठीक-ठाक विचारों की दवाई 
पिलानी शुरू कीजिए.
कोई एक बेहतरीन विचार सेलेक्ट कीजिए 
और दिनभर में
उसकी मात्रा कुछ दिन बढ़ाते रहिए.

कुछ दिनों बाद आप देखेंगे कि अब 
विचारों की भीड़ कटने - छटने लगी है
और ये उन्ही विचारों पर ज्यादा 
फोकस कर रहा है,
जो आप चाहते थे कि ये फोकस करे.

अब आपकी भी बॉडी लैंग्वेज वैसी ही बन जाएगी,
जैसे आपके विचारों का सॉफ्टवेयर तैयार हुआ है.

अपने आस-पास देखिए. खुद को भी देखिए.
सब वैसे ही बनते जा रहे हैं, 
जैसे विचारों को उन्होंने दिल से अपनाया है.

यानि जिन विचारों पर आपका ज्यादा फोकस है, 
वो ही आपका व्यक्तित्व है.

इसमें सही-ग़लत जैसी डेफिनिशन नहीं है.
बस इतना है कि
कोई भी, कुछ भी बदल सके या ना सके,
लेकिन कैसे विचारों के साथ अपना दिन बिताए 
कि दिन बेहतरीन हो उठे,
ये पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी, क्रिएटर ने इंसानों के सुपुर्द ही कर रखी है.

आप क्या क्रिएट करते हैं?
उससे क्या बनाते हैं.
ये आपका अपना बिज़नेस है.

दिमाग आपके बिज़नेस को हमेशा 
बढ़ाना ही चाहता है.
दिमाग के डायरेक्टर आप ही हैं.
जहां तक हो सके,
इससे एक अच्छी फ़िल्म बनाइए.


इमेज सोर्स: गूगल  





  






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