Feb 16, 2020

और जीवन, आपके दर्द को भी, दवा में बदल देगा.






कुछ चीज़ें पहले से ही होती हैं.
कुछ बना ली जाती हैं.
कुछ बिगाड़ ली जाती हैं.
इन सबके पीछे क्या है, क्यों है और कैसे है?
ये फिलोसोफी गढ़ लेने जैसा है.

असली बात ये है कि ऐसा होता रहता है,
होता रहा है और होता रहेगा.
हर कोई अपनी वैचारिक बुद्धि से 
इसे डिफरेंट तरीके से एक्सप्लेन करता है.

जैसे
एक आदमी बीमार है तो
उसकी पत्नी, 
एक अलग बुद्धि से उसे देख रही है,
उसके बच्चे, 
एक अलग बुद्धि से उसे देख रहे हैं,
उसके पड़ोसी, 
एक अलग बुद्धि से 
एनालिसिस कर रहे हैं,
उसके रिलेटिव्स, एक अलग बुद्धि से 
आंकलन कर रहे हैं,
उसका ईलाज कर रहा डॉक्टर, 
एक अलग बुद्धि से काम कर रहा है,
उसका बॉस, 
एक अलग बुद्धि से उसकी बीमारी को 
देख रहा है.
वो बीमार आदमी भी, 
अपनी एक अलग बुद्धि से ख़ुद को देख रहा है.

जो जैसा भाव रखे हुए है,
उसी बुद्धि से, उस आदमी को देखा जा रहा है.

चीज़ एक ही हो रही है कि आदमी बीमार है
लेकिन जितने हैं, 
सब अलग-अलग तरीके से उस चीज़ को 
महसूस कर रहे हैं.

तो जब आप कहते हैं कि 
ये ग़लत है और ये सही और ये वो, ये वो.
तो बस इतना है कि कोई घटना घट रही है और
आप उसे अपनी बुद्धि के हिसाब से 
उसमें राईट या रॉंग की राय बना रहे हैं.

लाइफ़ में भी ऐसी ही अनगिनत चीज़ें 
या घटनाएं हैं,
जो आपसे जुड़ी हों या ना भी जुड़ी हों, 
फ़िर भी हो रही हैं.
जिन चीज़ों को घटना है, वो घटेंगी ही.

किसी के एनालिसिस से उपाय तो 
संभव हो सकते हैं
लेकिन कोई सबके हिसाब से उसे 
सही या ग़लत बनाना क्रिटिकल है.
क्योंकि भाव और बुद्धि का दायरा, 
वेरिएशन से भरा है.

गौर से देखिये,
जितनी ज्यादा भीड़ होती है,
उतना शोर पनपता है.
लेकिन रिजल्ट ओरिएंटेड अच्छी चीज़ें, 
बाहर निकल आयें,
ये नहीं हो पाता क्योंकि
चाहे भीड़, 
माइंड के विचारों की हो
या बाज़ार के गलियारों की,
भीड़, एक बुद्धि से गाइडेड नहीं है,
एक संतुलित भाव से उपजाऊ नहीं है.

और हर किसी के आस-पास ऐसी ही भीड़ है.
विचारों की, लोगों की, चीज़ों की, घटनाओं की,
समस्याओं की, समाधानों की, उपायों की.
और बुद्धि उपाय नहीं है.
वो तो एनालिटिकल टूल मात्र है.

समाधान तो बस ये है कि
उस चीज़ या घटना के हिसाब से, 
उस पल में कौन, क्या कंट्रीब्यूट कर सका.
जिससे चीज़ें, अच्छे रिजल्ट में बदल सकीं 
या और अधिक नुकसान से बच सकीं.
क्योंकि जो घट चुका है,
वो रिवाइंड तो होने से रहा.

तो, जो चीज़ें आपको पसंद नहीं भी हैं,
उनके साथ ख़ुशी से रह पाना 
और जीना सीखते रहना,
इसे एक लर्निंग की तरह एक्सेप्ट 
करते हुए जिएं
और जीवन, 
आपके दर्द को भी, दवा में बदल देगा
और शायद फ़िर दुआ में भी.


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Feb 12, 2020

सुबह और शाम, केवल 5 मिनट. थैंक यू.





सुबह, दोपहर और शाम.
जागते हुए ये 3 एलिमेंट,
एक इवेंट की तरह गुजरते हैं.

कितने ही होंगे,
जिन्हें आज का सूरज देखने का मौका
शायद ही मिला हो.

कितने ही होंगे,
जिन्हें आज की दोपहर बमुश्किल 
ही नसीब होगी
और 
कितने ही होंगे,
जिनके लिए आज की रात, 
उनकी विदाई की रात होगी.

लाइफ़ ऐसे ही ट्रीट करती है.
बिना बताए, बिना पूछे फ़ैसले करती है
और आप, कहीं अपील भी नहीं कर सकते.

हां, इस दर्द से आदमी दुखी भी होता है
या अपने दर्द को सुख में ट्रांसफॉर्म कर सकता है.
ये क्लू मिलता रहता है कि
इस दुनिया में बनने-बिगड़ने के खेल,
माइंड का, एक एक्सरसाइज कम्पोनेंट है.

आप यहाँ क्या बन कर रह सकते हैं?
और कब तक?
कुछ बनने या ना बनने के बीच में क्या दुःख है?
जो सता रहा है.
उसे पकड़ लें 
तो तनाव की अकड़ ढ़ीली पड़ जाती है.

जिस दिन आपके जहन को, 
ये सवाल छू कर गुजर जाते हैं,
जीने के असली पल, उसके फ़ौरन बाद आते हैं.

तब दिमाग की शिकायतें थम सकती हैं,
निराशा घर छोड़ कर भाग जाती है.

तो सुबह,
केवल 5 मिनट,
थैंक यू.
और हर शाम, केवल 5 मिनट,
सोने से पहले, थैंक यू.

किसे थैंक यू?
थैंक यू इन साँसों को,
थैंक यू शरीर को,
थैंक यू बेड को.
थैंक यू फैमिली को,
थैंक यू दोस्तों को,
थैंक यू सूरज को, उसकी लाइट को,
थैंक यू फूलों को, नेचर को, पेड़ों को,
थैंक यू साथ देने वालों को,
थैंक यू साथ ना दे पाने वालों को,
थैंक यू धरती को,
थैंक यू वेल्थ को,
थैंक यू हेल्थ को,
थैंक यू बहती हवा को,
थैंक यू हर अदा को,
थैंक यू स्ट्रेंथ को,
थैंक यू इमेजिनेशन को,
थैंक यू फ्रीडम को,
थैंक यू क्रिएटिविटी को,
थैंक यू सही डर को,
थैंक यू अपने घर को,
थैंक यू बहते साउंड को,
थैंक यू बहती एनर्जी को,
थैंक यू वाइब्रेशन को,
और थैंक यू लाइफ़ को.
कहते चलें.

और जीवन सीखते रहने,
आभारी होने और चिल करते रहने का
सिलसिला बना रहेगा.

फ़िर, चाहे आपको नरक भी भेज दिया जाए,
आप उसे भी स्वर्ग बना लेंगे.

बाहर चाहे जो मर्ज़ी चलता रहे,
जिसकी मर्ज़ी से चलता रहे,
कम से कम आपके भीतर,
आपकी मर्ज़ी चलने से
आपको कौन रोक रहा है?

ख़ुशी तो भीतर से ही आ रही है
और दुःख भी भीतर का ही प्रोडक्ट है.
सही प्रोडक्ट खरीदिए.
लिमिटेड टाइम ऑफर है.
संतुलन लाने का सफ़र है.
संतुलन बिगड़ना आसान है,
बनाए रखने के लिए थोड़े तो
पापड़ बेल ही लेने चाहिए.


तो सुबह, भीतर से जागें
और शाम, भीतर से सोयें.
बाहर अटकना, कुछ दिनों के लिए बंद करें.


शिकायतों की रोटी तो वैसे भी पक ही रही है.
अपने “हेट यू” को “थैंक यू” से रिप्लेस कर लें.
चॉइस आपकी, क्योंकि लाइफ़ आपकी.

तब शायद समय,
आपको, 
जिंदादिल बनाने के लिए तैयार मिल सके?

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Feb 11, 2020

उम्र बढ़ने के साथ, सेल्फ़-हेल्प ही प्रैक्टिकल विकल्प बचता है,






संडे की वो शाम भी, गज़ब की ही रही.
चाय पीकर, थोड़ा टहलने का मौका मिला,
तो चूका नहीं मैं.

घर वाली रेस्पोंसिबिलिटी निभा के,
अपने लिया थोड़ा जीवन निकलना
बड़ा टफ हो जाता है.
नाराजगी से ज़िल्लत का जोखिम कौन ले?
नौकरी में ही पेट भर जाता है.

हालांकि कोई प्रेशर नहीं होता,
मगर मन कहता है कि जितना हो सके,
पहले ये, फ़िर तुम.
तसल्ली, कभी-कभी ख़ुशी से भी, 
बड़ी चीज़ लगती है.
है ना?

गाहे-बगाहे कोशिश रहती है कि
ख़ुद से भी मिला जाए,
हवाओं से बातें हों,
पंछियों से संवाद हो,
आसमां की लालिमा से मुलाकात हो
और चाँद की चांदनी भीतर उतर जाए.

इसके लिए कोई टाइम-टेबल नहीं बनता.
जब मौका लगे, तभी ठीक.

अब पहले जैसे दोस्तों का 
जमघट नहीं लग सकता.
सब दूर-दूर अपने जीवन में बिजी, जैसे मैं.

शिकायत तो बिलकुल भी नहीं, 
हां मगर, मिस वो होते रहते हैं.
फ़ोन से याद करना, जैसे फॉर्मेलिटी की रेसिपी.
तो नहीं हो पाता.
हां, सुख-दुःख के हिस्से फ़ोन से 
इधर-उधर बिखर ही जाते हैं.

उम्र बढ़ने के साथ,
सेल्फ़-हेल्प ही प्रैक्टिकल विकल्प बचता है,
करना पड़ता है.
करना चाहिए भी.

तो संडे,
मीठा सा मौसम और टहलना.
लोगों के चेहरे नज़र आना, 
लेकिन सब अनजाने.

बड़े होकर, बड़े शहरों में बसना
यानि ख़ुद के साथ ही हंसना.

फ़िर पैरों ने कहा - बस कर. घर चल.
लौट गए साहब.
 आकर पसर गए.
कुछ नए-पुराने चेहरे आंखों के सामने घूमने लगे.

तब अचानक याद आया कि
बचपन में बड़ों ने बताया था कि 
सब परमात्मा के अंश हैं.

हंसी तो बहुत आई.
कैसे-कैसे अंश देखने को मिलते हैं.
कोई गूंगे, कोई बहरे, कोई गुमसुम,
कुछ शोर वाले, कुछ खोपड़ा-खाऊ, कुछ पकाऊ से,
कोई कंजूस, कोई लड़ाईबाज़, 
कोई ड्रामेटिक तो कोई शक्की,
कोई उदासी के केक सा, 
कोई उम्मीदों का सुल्तान 
तो कोई इंफो एक्सचेंजर,
कोई डूबा हुआ, कोई भागा हुआ, 
कोई उलझा हुआ तो कोई सताया हुआ.
जैसा बताया था, 
वैसा – वैसा तो रेयर ही कोई दिखाई देता है.
दिखता भी है तो जल्द ओझल हो जाता है.

खैर,
मैं इन अंशो को कागज़ के पन्नों में 
समेट ही रहा था कि
अचानक रसोई से एक 
तेज आवाज़ उभरी – रोटी खा लो.
सरसों का साग बनाया है.

बस फ़िर क्या था.
थैंक यू के साथ भूख मिटने का सफ़र शुरू हुआ
और सोने पर जाकर ही रुका.

कई संडे, वाकई यादगार होते हैं.
जैसे तुम.
अफ़सोस, ये बीत भी जल्दी जाते हैं.


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Feb 7, 2020

रेड पेन लेना. ब्लू तो नार्मल है ही.





जीवन की ABCD में,
आप कोशिश करते हैं कि सबके 
लिए अवेलेबल रहें,
लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी
कुछ ना कुछ मिस रह जाता है.

कभी कोई रिश्ता चुप हो जाता है
या कोई दोस्त छूट जाता है
या कोई काम पेंडिंग रह जाता है.
स्ट्रेस सर पकड़ लेता है.

कभी कभी ऐसा नहीं हो पाता कि
आपका सोचा हर प्लान समय पर पूरा हो जाए.

ऐसा हो जाता है कि
कि आप आराम करना चाहते हों और
चीज़ें आपको बिजी कर दें.

ऐसा हो जाता है कि
कि आप कहना कुछ चाहते हैं
औए सामने वाला उसे वैसा नहीं समझ पाये.

ऐसा हो जाता है कि
आपने सेलिब्रेशन का मूड बनाया
और अचानक से कोई ऐसी प्रॉब्लम निकल आई
कि सेलिब्रेशन तो दूर चाय का कप 
भी नसीब ना हो सका.

ऐसा हो जाता है कि
आपका बर्थडे हो और
जिससे विश की, आप सबसे ज्यादा 
उम्मीद कर रहें हों,
वो या तो बाहर हो या 
आपका बर्थडे भूल ही जाए.

ऐसा हो जाता है कि
आपको इन्क्रीमेंट मिलने का इंतजार था और
कंपनी ने लोस डिक्लेअर कर दिया.

ऐसा हो जाता है कि
आपने सोचा था ये हो,
लेकिन हो वो जाता है.

अक्सर ऐसा हो जाता है.
बच्चे वो नहीं करते, जो आप चाहते हैं.
पार्टनर वो नहीं सुनते, जो आप सुनाना चाहते हैं.
फ़ायदा वैसा बिलकुल नहीं होता, 
जैसा आपको चाहिए था.
नतीजा, स्ट्रेस सर चढ़ कर नाचने लगता है.

अक्सर ऐसा हो जाता है.
आप चुनते A को हैं और सामने 
Z आकर खड़ा हो जाता है.
आप चाहते हैं क्रिकेट को और 
आपको फुटबॉल चुनना पड़ता है.

तो जब भी ऐसा कुछ हो जाए
तो घबराइए मत.
बल्कि इस स्ट्रेस को एक नया मीनिंग दे डालिए.

अपनी पसंद का एक पेन और 
एक पतला रजिस्टर खरीदें.
रजिस्टर के लेफ़्ट पेज पर अपनी समझदारियां
और राईट पेज पर अपनी बेवकूफियां,
पॉइंट टू पॉइंट लिख डालिए.
इस ट्रेंड को कंटिन्यू करने की कोशिशें जारी रखिए.

कुछ दिनों बाद आप देखेंगे
कि जब-जब, आपकी बेवकूफियां ज्यादा होती हैं
तो आप रिलैक्स्ड और हंसमुख फ़ील करते हैं
और जब, समझदारियां ज्यादा होती हैं
तो स्ट्रेस और सीरियसनेस बढ़ जाती हैं.
ये तरीका प्रैक्टिकल भी है.

तो आगे से, जब भी आपको लगे कि
आपकी पसंद का कुछ नहीं हो रहा है
तो तुरंत चेक कीजिए कि
लेफ़्ट और राईट में से
किसका पलड़ा भारी है
और आप यक़ीनन मुस्कुरा उठेंगे,
बिना किसी से उम्मीद के.

अब जीना हल्का और आसान है.
और ऐसा ही होता है.

अच्छा, एक बात और.
रेड पेन लेना. ब्लू तो नार्मल है ही.
टेक केयर.



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