Mar 7, 2020

ठीक एक साल पहले, तुम यहीं थी मां.





आज पूरा एक साल हो रहा है.
आपके बिना रहने की आदत डालने का,
मां.

पिछले 365 दिनों में हमनें,
हज़ारों दिनों की नियामतें याद की.
आपसे बड़ी कोई नहीं निकली.
आगे होगी भी नहीं,
इतना पता है.

जिस तरह से आपने बड़ा किया.
ख़ुद को तोड़कर, हमें खड़ा किया.
उसके लिए शब्दों की बारीकियां
और गहराइयां तक फीकी हैं.

शिव पर सबकुछ छोड़कर, आपने
हमारी रक्षा का कवच, 
बचपन में ही बांध दिया था.
और शिव भी कमाल निकले.

उन्होंने आग से भी भीषण परिस्थिति को,
हमें झुलसाने से पहले ही, 
गंगाजल से ठंडा कर डाला.

मुझे याद है, आपका हमारे लिए दौड़ भाग करना,
चिंतित होना और डरा-सहमा भी होना.
वो चाहे किसी से भी हो,
भविष्य से या किसी भी दूसरे आयाम से.

सालों पहले ही हमें, आभास हो गया था
कि माता को पिता से एक पायदान,
ऊपर का दर्ज़ा क्यों मिलता है?

चाहे वो किसी भी तरह की समस्या हो,
आपसे बात करके, चींटी सी हो जाती थी.

पिता का डर, हमें हमेशा लगता रहा
फ़ायदा ये रहा कि भटकने के डर से, 
कम से कम मुक्ति थी.
उन्होंने भी चीज़ों को ओपन हैंडल 
करने की छूट दी,
जिससे ज़िम्मेदारी लेने की भावना पनप सकी.

लेकिन मां के प्रेम में जो ताक़त है,
उसका एहसास इतना रेफ्रेशिंग है कि
भुलाए नहीं भूल सकता.

किसी भी बात के लिए, आपको याद करना,
एक मुकाम के सामने खड़े हो जाने जैसा है.

फ़िर चाहे वो हमारी देखभाल करना रहा हो,
हमें नेगेटिव से पॉजिटिव विचारधारा देना रहा हो,
चमत्कारों में विश्वास करना रहा हो,
किसी को भी, किसी भी एंगल से 
धोखा ना देना रहा हो,
6th क्लास में मुझे निबंध लिखवा कर, 
प्राइज दिलाकर, कांफिडेंस देने का रहा हो,
या अपनी कहानियों के माध्यम से 
जीवन का सार कहने का रहा हो.

अपने रोने के बहाने को खुशियों में 
तब्दील करने की कला हो,
या अपनी सीमाओं को विस्तार देने की 
अनूठी विरासत को आगे बढ़ाने के एफर्ट हों,
ज़रूरत के समय, सहायता की तत्परता 
का गुण हो,
अपने से नीचे, जीवन-यापन करने वालों के 
प्रति करुणा का भाव विकसित करने की बात हो
और अपने से जुड़े संबंधों को 
सम्मानपूर्वक निभाने के अंदाज़ हों,
ये आपसे ही ट्रांसफर हुए होंगे
क्योंकि
हमारे भीतर इतना उजाला टिक पाने के 
चांसेस बेहद ही कम थे.
आज भी वो धुंधलापन साफ़ 
होता नज़र नहीं आता.

इतना कुछ है कहने को
कि लिखते-लिखते सदियां बीत जायें

लेकिन आज इतना ही मां कि,
किसी भी एंगल से आपने हमें संतुलित करने
और पिता जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर
चलने के अपने कर्म से विमुखता 
शायद ही कभी दिखाई हो,
सिवाय आपके अस्वस्थ होने के क्षणों के.

आपके सम्मुख आई विकट सिचुएशन 
को भी हमनें
मार खाते ही देखा.
फ़िर चाहे वो ब्लड प्रेशर हो 
या कोई सोशल प्रेशर.

आपके जाने के कुछ दिनों बाद छोटू भी 
साथ छोड़ गया और 
अभी कुछ दिनों पहले ही,
हमारे प्रिय, मामा जी भी.

मुझे लगता है, लाइफ़ को इतना सीरियस लेने की

जरुरत सिर्फ़ अमर लोगों को होनी चाहिए.


खैर,
आपकी जीवटता के कुछ अंश,
हमारे भीतर भी अंतिम सांसों तक 
जीवित रह सकें,
हर जन्म में सेवा का मौका देना मां.
इसी आशीर्वाद की अभिलाषा के साथ,
आपको सलाम नमस्ते.




इमेज सोर्स: गूगल









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