Apr 24, 2020

माइंड के लॉकडाउन में, हार्ट की बल्ले-बल्ले.






चिंता के भी, अपने डोमेन साइज़ होते हैं.
इसका सही-सही पता लगाने के लिए,
Step बाय Step नहीं चलना,
केवल एक Step जाना है.
फ़िर रुके रहना है.
वो भी अपने अनुसार.
उस समय, किसी की गुलामी नहीं.
ना अपनी, ना किसी और की.

इन This Step,
आप पहले Ensure कर लें कि 
जो भी आप अनुभव करते हैं,
वो कहाँ हो रहे हैं? 
आपके भीतर या बाहर?

कुछ Seconds के बाद, 
आपको Click कर जाएगा कि
सबकुछ तो Inside Story है.
इससे आपको तसल्ली की Deep फ़ील आएगी.
कोई देख भी नहीं सकता,
क्योंकि सारी Film, 
आपके अंदर ही शूट हो रही है,
लिखी जा रही है और डायरेक्ट हो रही है.
इसका Director कौन है? 
और आप क्या Role कर रहें हैं?
और क्यों कर रहें हैं?
ये तीन चीज़ें ही पता करनी है.

इसको एवें ही ना समझ लें.
आदमी इसी गलती की सज़ा, 
सदियों से भुगत रहा है और
दूसरों को भी भुगतवा रहा है.
ये समय है,
इसे ठीक करने का.

वैसे भी लॉकडाउन है,
बेबसी घर बैठ गई है.
किसी के पल्ले, 
कुछ भी नहीं बचा है,
शेखी बघारने को.
सब जान गए हैं कि
किसी घड़े में पानी नहीं है.
कोई और ही बादल है.
कम से कम, मैं तो नहीं.

तो अगर ख़ुद से और जिंदगी से,
अच्छे और टिकाऊ रिजल्ट चाहिए तो
थोड़ा सा, साइंटिफिक तरीके से,
ख़ुद के भीतर उतरना ही होगा.

चुपचाप.
कोई और ना हो, उस समय, आपके भीतर.
ब्लेंक.

आपको देखना भर है.
रियेक्ट नहीं करना.
विरोध नहीं करना.
झुंझलाहट आएगी.
अजीब सा होगा पहली दफ़ा.
दिमाग, बाहर भागने की डिमांड करेगा.

यहां आपको, थोड़ा सेल्फिश होना होगा,
थोड़ा स्ट्रोंग भी कि, 
मैं आज तक, दूसरों के अंदर, झांकता घूमा हूं,
उनका इनफार्मेशन ऑफिसर बना घूमता हूँ,
चिंता करता, जेलस होता, 
तुलना करता, किस्मत-किस्मत चिल्लाता,
कलयुग-कलयुग बकता,
अपनी बकवास से फुर्सत नहीं ली मैंने.
दिमाग का झूला, झुलाता रहा हूँ,
बिना रुके, बिना थके.

मगर आज, इस पल, मैं इसकी सुनने वाला नहीं.

फ़िर आपका डर कम होना शुरू होगा.
अब आप आँखें बंद करके देखिए
कि ये अच्छे-बुरे विचार आ कहाँ से रहे हैं?
इनका सोर्स क्या है.
कौन, इन्हें, मेरे दिमाग में पैदा कर रहा है?
मैं, इतना सड़ियल कैसे बन गया हूं.

मन ही मन, अपनी इतनी इंसल्ट कीजिए कि,
कुछ देर के लिए दिमाग, 
आपको अकेला रहने दे सके.
दिमाग से दूरी मतलब नई सुबह का आगाज.

दिन में, रात में, शाम में,
जब भी आप, अपने प्रोफेशनल ड्रामे से 
बाहर निकल सकें,
आपको लगे कि चिंता करने को छोड़कर,
इस टाइम तक के, 
लगभग सारे काम पूरे हो चुके हैं,
तो 10-15 मिनट बैठ कर या लेटकर,
आराम से इस प्रोसेस को रेगुलर करने की कोशिश करें.

कुछ समय तक ऐसा लगातार
करते रहने से,
आपके दिमाग का कचरा, 
साफ़ होना शुरू हो जाएगा.
और एक दिन ऐसा आएगा कि आप, 
दिन के कुछ पलों में,
वैसा ही फ़ील करना शुरू कर देंगे,
जैसा Day One पर थे.

Tough है,
लेकिन Impossible नहीं.
हर कोई, ऐसा ही चाहता है,
इच्छा रखता है
कि उसके बचपन की Innocence, 
कभी ख़त्म ना हो.

ये ख़त्म नहीं होगी,
अगर आप इसे Save करके रखना चाहेंगे,
जैसे दूसरी चीज़ें रखते हैं.

पर Innocence की
झलक पाने के लिए आपको,
उम्र रोक लेने की Pray करते रहने से, 
कुछ नहीं होगा.  
सिर्फ़ अपने भीतर जाकर,
पहले, अपने ह्रदय का कमरा, ख़ाली करना होगा,
जिसमें, कचरों के ढेर, लगे पड़े हैं.
कचरा साफ़ होते ही, 
आपकी Innocence
ख़ुद ब ख़ुद आपके भीतर 
और फ़िर बाहर उतर कर नाचने लगेगी.

अब यादें, आपको तंग करने की बजाय,
लुत्फ़ उठाने का मौका देती रहेंगी.

लॉकडाउन में इतना अच्छा रिजल्ट मिलना,
भाग्यशाली होना नहीं, तो और क्या है?

थोड़ी भी, मुस्कराहट आई,
ये ही दुआ,
मुझे भी दुआ.


इमेज सोर्स: गूगल

Apr 15, 2020

जीरो बटे सन्नाटा




जब मैं बिलकुल शांत होता हूं, तो
सबकुछ, मुझे अपना दिखाई देता है.
मैं ही तुम.
तुम ही मैं.
कोई डिफरेंस रह ही नहीं जाता.

थोड़ा, अटपटा तो लगता है
कि 21वीं सदी में,
टेक्निकल एजुकेशन लेने के बाद भी,
कोई सोचेगा तो क्या कहेगा.
घर वाले, बाहर वाले, जीजे-साले,
आदि-आदि.
वो पैकेज से बाहर निकलें, तो ही ना कुछ हो.

फ़िर मैं, थोड़ा दिमाग लगाता हूं,
ताकि किसी को ये भी ना लगे कि मैं,
उन जैसा नहीं हूं और
मेरा काम भी सध जाए.
प्रैक्टिकल बने रहने की एक्टिंग करना,
फिल्मों में काम करने से भी, कितना टफ है.
मुझ जैसे बेवकूफ़ और बुद्धू लोग,
ये आसानी से समझ सकते हैं.

अलबत्ता,
मैं सुबह उठता हूं,
तो अस्तित्व को धीमे से, 
थैंक यू कर देता हूं,
बिना कंफ्यूज हुए कि
भैया, आपने आज की सुबह दिखाई, शुक्रिया.

फ़िर, चाय बनाने से दिन, पुकारना शुरू करता है.
उसके बाद, मैं,
मुझ से जुड़े हुए, 
सभी लोगों के काम कर देता हूं.
पर्सनल, इमोशनल,
सामान ले आना, चाय बना देना,
लैपटॉप पे उनकी पढ़ने-पढ़ाने में हेल्प कर देना,
ऑफिशियल वर्क फ्रॉम होम असाइनमेंट्स,
किसी का बर्थडे विश, 
हैप्पी न्यू इयर, सेफ @ होम केयरिंग,
और जो भी छोटे-बड़े सांसारिक कर्म डिफाइन हैं, लगभग सभी.
कुछ देर दुखी भी रह लेता हूं,
चाहे मन हो या ना हो.

इन दिनों,
ख़ुद के साथ रहने को,
ज्यादा समय मिल रहा है तो
उसके लिए जो भी ज़िम्मेदार है,
उसका मन ही मन, गुपचुप तरीके से,
आभार भी व्यक्त हो ही जाता है.

अच्छा, एक और मस्त बात है कि
अब मुझसे, दूसरों को काफ़ी कम, 
शिकायतें रहने लगी हैं.
पहले तो भागा-दौड़ी के चलते, 
किसी एक का काम भी, पेंडिंग रहा करता,
तो नाराजगी के दौर, 
माइक्रो सेकंड्स से मिनट्स में बदल जाते थे.

अब, काफ़ी आराम है.
सबकुछ एक लेवल पर सिमट के, चिपका पड़ा है.
रूटीन के काम, बहुत सिंपल और कम हो गए हैं.
तो भड़ास का लेवल भी, कम से कम है.
बाहर से भी, ठंडी हवा ही आ रही है.

वाह, क्या दौर है.
मुझे तो जैसे सदियों बाद, 
स्वर्ग नसीब हुआ हो.

खैर,
जब सबका पेट, 
मेरी उम्मीदों से भर जाता है,
तो कुछ ऐसे पल, आ ही जाते हैं,
जब मैं, अपना पसंदीदा म्यूजिक सुन सकूं.
ख़ुद में, सिमट सकूं
और बिलकुल हल्का हो जाऊं.

और तब मैं, ख़ुद से, जीने की परमिशन लेता हूं.
सबकी सेवा के बाद ही, 
अपना अधिकार माँगना ही तो,
नेचुरल चीज़ है.
मुझे नेचुरल रहना ज्यादा पसंद है,
बिना ओवर-डोज़ के.

फ़िर तो,
पंख लग जाते हैं मेरे,
ऐसी लहरें उठती है,
जिसे शब्दों में उकेरना
मानों, 
किसी पत्तल की सतह पर पानी की
बूंदे डालते रहना.

कितनी सुंदर जगह बनाई गई है.
एक घास के तिनके से लेकर नदियां, 
सागर, पहाड़, जीव-जंतु, खिलते फूल, 
खुशबू बिखेर के चलती हवा,
अनंत सुख़ के पल.
आनंद के पल.
जीरो बटे सन्नाटा हो जाता है.

सुख़ – दुःख,
अपना-पराया,
तीखा-मीठा,
आगे-पीछे,
सक्सेस-फेलियर,
अगला-पिछला,
सब गायब हो जाता है.
वो ही बचता है, जो होता है.
वो ही रहता है, जो बचता है.

कुछ मिनटों का ये सफ़र,
असीम ऊर्जा, निश्चलता, 
प्यूरिटी और आनंद से मुझे भरकर,
वापिस मुझे, अपने संसार में भेज देता है.

मैं फ़िर से कुछ घंटो के लिए, 
घंटूनाथ बन के बजने लगता हूं,
और दोबारा से ख़ुद से मिलने का, 
इंतजार करता रहता हूं.

जीवन क्या है? मुझे पता नहीं चल पाता.
आनंद क्या है, 
ये हल्की सी जानकारी होने लगी है.

बस इतना है कि इन शांति के पलों के लिए,
पूरा दिन, पहले तपना पड़ता है,
तब कहीं जाकर,
तसल्ली के कुछ पल,
हर किसी की जिंदगी को, 
नसीब होते होंगे.

ऐसी आज़ादी और कहां?
ये सोचकर मैं, मुस्कुराने भी लगा हूं आजकल.

सचमुच, कोई भी नई चीज़,
कुछ अच्छा, ज़रूर लेकर आती है.

ऐसा, सबको सोचते रहना चाहिए.
शांत बने रहने तक.



इमेज सोर्स: गूगल