Apr 15, 2020

जीरो बटे सन्नाटा




जब मैं बिलकुल शांत होता हूं, तो
सबकुछ, मुझे अपना दिखाई देता है.
मैं ही तुम.
तुम ही मैं.
कोई डिफरेंस रह ही नहीं जाता.

थोड़ा, अटपटा तो लगता है
कि 21वीं सदी में,
टेक्निकल एजुकेशन लेने के बाद भी,
कोई सोचेगा तो क्या कहेगा.
घर वाले, बाहर वाले, जीजे-साले,
आदि-आदि.
वो पैकेज से बाहर निकलें, तो ही ना कुछ हो.

फ़िर मैं, थोड़ा दिमाग लगाता हूं,
ताकि किसी को ये भी ना लगे कि मैं,
उन जैसा नहीं हूं और
मेरा काम भी सध जाए.
प्रैक्टिकल बने रहने की एक्टिंग करना,
फिल्मों में काम करने से भी, कितना टफ है.
मुझ जैसे बेवकूफ़ और बुद्धू लोग,
ये आसानी से समझ सकते हैं.

अलबत्ता,
मैं सुबह उठता हूं,
तो अस्तित्व को धीमे से, 
थैंक यू कर देता हूं,
बिना कंफ्यूज हुए कि
भैया, आपने आज की सुबह दिखाई, शुक्रिया.

फ़िर, चाय बनाने से दिन, पुकारना शुरू करता है.
उसके बाद, मैं,
मुझ से जुड़े हुए, 
सभी लोगों के काम कर देता हूं.
पर्सनल, इमोशनल,
सामान ले आना, चाय बना देना,
लैपटॉप पे उनकी पढ़ने-पढ़ाने में हेल्प कर देना,
ऑफिशियल वर्क फ्रॉम होम असाइनमेंट्स,
किसी का बर्थडे विश, 
हैप्पी न्यू इयर, सेफ @ होम केयरिंग,
और जो भी छोटे-बड़े सांसारिक कर्म डिफाइन हैं, लगभग सभी.
कुछ देर दुखी भी रह लेता हूं,
चाहे मन हो या ना हो.

इन दिनों,
ख़ुद के साथ रहने को,
ज्यादा समय मिल रहा है तो
उसके लिए जो भी ज़िम्मेदार है,
उसका मन ही मन, गुपचुप तरीके से,
आभार भी व्यक्त हो ही जाता है.

अच्छा, एक और मस्त बात है कि
अब मुझसे, दूसरों को काफ़ी कम, 
शिकायतें रहने लगी हैं.
पहले तो भागा-दौड़ी के चलते, 
किसी एक का काम भी, पेंडिंग रहा करता,
तो नाराजगी के दौर, 
माइक्रो सेकंड्स से मिनट्स में बदल जाते थे.

अब, काफ़ी आराम है.
सबकुछ एक लेवल पर सिमट के, चिपका पड़ा है.
रूटीन के काम, बहुत सिंपल और कम हो गए हैं.
तो भड़ास का लेवल भी, कम से कम है.
बाहर से भी, ठंडी हवा ही आ रही है.

वाह, क्या दौर है.
मुझे तो जैसे सदियों बाद, 
स्वर्ग नसीब हुआ हो.

खैर,
जब सबका पेट, 
मेरी उम्मीदों से भर जाता है,
तो कुछ ऐसे पल, आ ही जाते हैं,
जब मैं, अपना पसंदीदा म्यूजिक सुन सकूं.
ख़ुद में, सिमट सकूं
और बिलकुल हल्का हो जाऊं.

और तब मैं, ख़ुद से, जीने की परमिशन लेता हूं.
सबकी सेवा के बाद ही, 
अपना अधिकार माँगना ही तो,
नेचुरल चीज़ है.
मुझे नेचुरल रहना ज्यादा पसंद है,
बिना ओवर-डोज़ के.

फ़िर तो,
पंख लग जाते हैं मेरे,
ऐसी लहरें उठती है,
जिसे शब्दों में उकेरना
मानों, 
किसी पत्तल की सतह पर पानी की
बूंदे डालते रहना.

कितनी सुंदर जगह बनाई गई है.
एक घास के तिनके से लेकर नदियां, 
सागर, पहाड़, जीव-जंतु, खिलते फूल, 
खुशबू बिखेर के चलती हवा,
अनंत सुख़ के पल.
आनंद के पल.
जीरो बटे सन्नाटा हो जाता है.

सुख़ – दुःख,
अपना-पराया,
तीखा-मीठा,
आगे-पीछे,
सक्सेस-फेलियर,
अगला-पिछला,
सब गायब हो जाता है.
वो ही बचता है, जो होता है.
वो ही रहता है, जो बचता है.

कुछ मिनटों का ये सफ़र,
असीम ऊर्जा, निश्चलता, 
प्यूरिटी और आनंद से मुझे भरकर,
वापिस मुझे, अपने संसार में भेज देता है.

मैं फ़िर से कुछ घंटो के लिए, 
घंटूनाथ बन के बजने लगता हूं,
और दोबारा से ख़ुद से मिलने का, 
इंतजार करता रहता हूं.

जीवन क्या है? मुझे पता नहीं चल पाता.
आनंद क्या है, 
ये हल्की सी जानकारी होने लगी है.

बस इतना है कि इन शांति के पलों के लिए,
पूरा दिन, पहले तपना पड़ता है,
तब कहीं जाकर,
तसल्ली के कुछ पल,
हर किसी की जिंदगी को, 
नसीब होते होंगे.

ऐसी आज़ादी और कहां?
ये सोचकर मैं, मुस्कुराने भी लगा हूं आजकल.

सचमुच, कोई भी नई चीज़,
कुछ अच्छा, ज़रूर लेकर आती है.

ऐसा, सबको सोचते रहना चाहिए.
शांत बने रहने तक.



इमेज सोर्स: गूगल 

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