Nov 30, 2020

आप गिटार बजाना कब स्टार्ट कर रहे हैं?

 


कोई भी जीवन आज़ाद रहने को

सबसे बड़ा आनंद मानता है.

 

कभी ये बंधन, कभी वो बंधन,

बेवजह के दुखों की मिक्स्ड वेज

सूचनाओं का जंजाल और उस पर भी

नेगेटिव सूचनाओं की भरमार.

कभी ये चिंता और कभी वो चिंता.

 

इन सबके बीच आदमी चाहता है

थोड़ा रिलैक्सेशन.

उफ़ से थोड़ा हल्कापन.

 

आदमी जब तक शादी नहीं करता

उसे लगता है ये ही सबकुछ है.

किस्मत से उसने एक पार्टनर जोड़ा

तो अच्छी शुरुआत के बाद भी

कुछ सालों बाद ख़लबली.

फ़िर बच्चों का आगमन तो और ख़लबली.

 

ऐसे ही करियर के साथ भी.

हर समय ग्रोथ की चिंता.

डर का माहौल.

मंदी में तो डर रियलिटी में भी बदल जाता है.

 

जहाँ हैं, वहां बोर

लेकिन फ़िर भी लगे रहता है

क्योंकि बचपन से रटाया गया है कि

बिजी रहो, चाहे कैसे भी रहो.

 

रिश्तों के साथ भी ऐसी ही कवायद.

उम्र के साथ बढ़ती तल्खियां.

किसी का भी पेट नहीं भरता.

मानने-मनाने में ही गचपच होती रहती है.

 

अगर कुछ पैसा है तो कनाडा चलते हैं.

कनाडा वाला अमेरिका जाना चाहता है.

अमेरिका वाला किसी शांत देश में 

सेटल होने के सपने देखता है.

जो जहां भी है, पूरा नहीं है.

एक अधूरापन लिए लोग जिंदगी काट देते हैं

और फ़िर उम्मीद करते हैं कि

आज़ादी से रह सकें.

 

ये डबल माइंड कनेक्शन आदमी को

कंफ्यूज और बिजी रखता है

और इतने में जाने की बारी का 

समय पास आ जाता है.

 

इससे ज्यादा, इससे ऊपर आदमी 

अपनी सोच को नहीं ले जाना चाहता.

वो इस पृथ्वी की तरह ही 

गोल-गोल घूमने का आदी है.

ठीक वैसे ही जैसे सोरमंडल में गृह रोटेट करते हैं.

सुबह चल के वापिस वहीँ आ जाते हैं

और रिपीट साइकिलिंग.


सवाल ख़ुशी का है.

अगर आपने किसी भी तरीके से

ख़ुद को ख़ुश रखने के उपाय तलाश कर लिए हैं

तो शायद आज़ादी के कुछ पल आपको

दिखाई दे पड़े

मगर असली आज़ादी और असली ख़ुशी के लिए

बाहर की दौड़ नहीं, बल्कि अंदर की 

चमक पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

 

बाहर कितना भी मिल जाए,

इच्छा आपको व्यस्त करती रहेगी.

 

एक लेवल के बाद जब हर तरफ़ से 

आदमी थक जाता है.

सारे उपाय करने के बाद भी निराशा बनी रहती है.

तब वो भीतर की और मुड़ता है.

मजबूरी है. संसार की रौनक उसे तरसाती रहती है.

 

अगर सही जीवन का चुनाव करना है

तो थोड़ा आगे जाना ही पड़ेगा.

वही से कुछ अच्छी शुरुआत का संगीत

बजना शुरू होता है.

 

आप गिटार बजाना कब स्टार्ट कर रहे हैं?

 

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Nov 20, 2020

समय हमेशा ही एक जैसा रिएक्शन नहीं देता

 



वे दो भाई हैं.

एक बड़ा और एक छोटा.

प्यार बराबर है.

फैमिली कंबाइंड है तो

सुख-दुःख के दिनों में दूरियाँ नहीं रहती.

 

मैं छोटे भाई को जानता हूँ.

काफ़ी सालों पहले एक दोस्त के 

दोस्त के रूप में

मुलाकातें होती रही थी.

अब तो लगभग 22-23 सालों से 

मिलना-मिलाना दूभर है.

हाँ, ऑनलाइन ख़बरें और 

जानकारी मिलती रहती है.

 

दोनों भाई अपने मम्मी-पापा को 

बहुत प्रेम करते रहें हैं.

लेकिन समय हमेशा ही एक 

जैसा रिएक्शन नहीं देता.

 

अभी पता चला कि कोरोना के चलते

कुछ दिनों के गैप में ही उनके 

मम्मी-पापा दोनों को जाना पड़ा.

ये दुखद और हताश करने वाला था.

 

जिस पर बीतती है, वो

ही बता सकता है कि 

किस तरह का दर्द कई पलों

तक इंजेक्शन की तरह चुभता रहेगा.

 

सारे सपनों पर ब्रेक लग जाता है,

जब अचानक ऐसा हो जाता है 

जो सोचा ना जा सके.

 

खैर, लाइफ़ की ये ही बिसात आसमान की तरफ़

नज़र झुकाने पर मजबूर करती है.

 

ना कुछ कह सकते,

ना मिलने जाने का कोई रास्ता.

 

छोटा भाई स्वभाव से बहुत अच्छा रहा है,

मगर उससे मिल पाना या कुछ संवाद करना

संभव नहीं दिखता.

 

काफ़ी दिनों से बीमार चल रहे और

डायलिसिस पर रहे बड़े फूफा जी भी 

अब चल बसे हैं.

 

उन्होंने भी एक योद्धा की तरह 

अपना जीवन जीया है.

बुआ जी स्वावलंबी और शांतिप्रिय रही हैं लेकिन

दुःख की मात्रा यहाँ भी कम नहीं है.

 

जब किसी भी तरह से लोगों को जाते देखता हूँ

तो स्टेबल होने मकसद बेमानी से लगने लगते हैं.

एक दिन जाना तय है,

पर आप ये भी तय नहीं कर सकते.

मैच फिक्स है पर बल्ला आपके हाथ में नहीं रहेगा.

 

मौत एक समझदार टॉनिक है.

इसे पीते रहने से जिंदगी का सच

काला दिखाई नहीं पड़ता.

 

जो आ रहे हैं, उनका स्वागत.

जो जा रहे हैं, उनके प्रति संवेदनाएं.

 

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Nov 19, 2020

अब "हमेशा के लिए" जैसा कोई स्टैण्डर्ड काम नहीं करेगा.

 



समय के साथ चीज़ें बदल ही जाती हैं.

अब ये मेंडल थ्योरी या 

वंशानुगत विचारधारा से अलग तरीके के दिन हैं.

 

पहले जो होता था, वो होता था.

अब वो अतीत है.

बाद में जो होगा, वो होगा.

वो भविष्य है.

 

आदमी या कोई भी जीव

सिर्फ़ आज क्या है,

उसमें कैसे जीना है

और अधिकतम क्या किया जा सकता है,

ये ही आज की विशेषता है.


लाइफ शार्ट-पीरियड

वर्चुअल रियलिटी वर्शन हो चुका है.


छोटी-छोटी खुशियों में,

छोटे-छोटे पलों में ही ज़िंदगी की

खूबसूरती सबसे ज्यादा

निखर के सामने आती है.

अब "हमेशा के लिए" जैसा 

कोई स्टैण्डर्ड काम नहीं करेगा.

 

इतनी सूचनाएं आपके ऊपर नीचे घूमती हैं कि

कंफ्यूज होने के अलावा और

कोई आउटपुट नहीं है.

इसीलिए तसल्ली से, आराम से तय करें कि

अपने लिए और

अपने बच्चों के लिए जीवन कैसा हो.

अगर आपने 4-5 मोबाइल एप्प 

बनाने की क्षमता विकसित कर ली है

और आप का ये शौक भी बन चुका है 

तो ये कतई ज़रूरी नहीं है

कि आप IIT से ही पढ़ के बाहर निकले,

तभी समझदार कहलायेंगे.

बिना उसके भी आप अपने लिए

एक सुंदर आसमान का निर्माण कर सकते हैं.

अब जीवन हर पल खुशियों की चाभी तलाश रहा है,

ये कम्पटीशन से बहुत उम्दा

और अच्छा चुनाव है कि

एक चीज़ के लिए दूसरों से लड़ने की बजाय आप

आसान ख़ुशी भरा रास्ता चुनें.


जनरेशन भी अब वैसी नहीं रही हैं,

विकल्प अनेक हैं.

 

एकरूपता ऊबाऊ हो चुकी है.

 

तो बिना डर के जीना सीखें

और अपने बच्चों से भी जीना सीखें

क्योंकि जब आप उनकी उम्र में थे,

तो सबकुछ अलग था.

 

अब सबकुछ डेमोक्रेटिक होता जा रहा है.

अपनी वैल्यू गिराए बगैर

उनके इमोशन समझिए

तो ही जानेंगे कि पैदा करना और जीने देना,

दोनों नदी के दो किनारों जैसे हैं.

पानी भी नया है.

छपाक.

 

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