Apr 24, 2018

और वो है एक जोकर.....

चार्ली चैपलिन. बस नाम ही काफ़ी है. आज उनके कुछ कोट्स सिर्फ़ आप के लिए.

हंसी के बिना बिताया हुआ दिन बर्बाद किया हुआ दिन है.

हम सोचते बहुत हैं और महसूस बहुत कम करते हैं.

ज़िन्दगी करीब से देखने में एक त्रासदी है, लेकिन दूर से देखने पर एक कॉमेडी.

इस मक्कार दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है, यहाँ तक की हमारी मुश्किलें भी नहीं.

एक आवारा, एक सज्जन, एक कवि, एक सपने देखने वाला और एक अकेला आदमी, हमेशा रोमांस और रोमांच की उम्मीद करते है.

असफलता महत्त्वहीन है. अपना मजाक बनाने के लिए हिम्मत चाहिए होती है. जो हर किसी के पास नहीं होती.

सच में हंसने के लिए आपको अपनी पीड़ा के साथ खेलने में सक्षम होना चाहिए.

मैं ईश्वर के साथ शांति से हूँ. मेरा टकराव इंसानों के साथ है.

हास्य टॉनिक है, राहत है, दर्द रोकने वाला है.

मैं सिर्फ और सिर्फ एक चीज रहता हूँ और वो है एक जोकर. ये मुझे दूसरों की तुलना में कहीं ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है.

ज़िन्दगी बढ़िया हो सकती है अगर लोग आपको अकेला छोड़ दें.

हम सभी एक दूसरे की मदद करना चाहते हैं. मनुष्य ऐसे ही होते हैं. हम एक दूसरे के सुख के लिए जीना चाहते हैं, दुःख के लिए नहीं.

शब्द सस्ते होते हैं. सबसे बड़ी चीज जो आप कह सकते हैं वो है ‘हाथी‘.

मुझे लगता है कि सही समय पर गलत काम करना जीवन की विडंबनाओं में से एक है.

एक कॉमेडी फिल्म बनाने के लिए मुझे बस एक पार्क, एक पुलिसकर्मी और एक सुन्दर लड़की की ज़रुरत होती है.

मैं पैसों के लिए बिजनेस में गया, और वहीँ से कला पैदा हुई. यदि इस टिपण्णी से लोगों का मोह भंग होता है तो मैं कुछ नहीं कर सकता. यही सच है.

ये बेरहम दुनिया है और इसका सामना करने के लिए तुम्हे भी बेरहम होना सीखना होगा.

मैं यकीन नहीं करता कि जनता जानती है कि उसे क्या चाहिए; मैंने अपने Career से यही निष्कर्ष निकाला है.

अंतत: सबकुछ एक ढकोसला है.

भला कविता को अर्थपूर्ण होने की क्या आवश्यकता है?

मेरा दर्द किसी के लिए हंसने की वजह हो सकता है. पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए.

मैं हमेशा बारिश में टहलना पसंद करता हूँ, ताकि कोई मुझे रोते हुए ना देख सके.

Apr 23, 2018

नेचुरल लाइफ का स्वेटर...

सद्गुरु के खजाने के कुछ अनमोल मोती. आइये अपनी पसंद का कोई एक चुने और नेचुरल लाइफ का स्वेटर बुने.


कुंठा, निराशा और अवसाद का मतलब है कि आप अपने खिलाफ काम कर रहे हैं।

हर चीज को ऐसे देखना जैसी कि वो है, आपको जीवन को सहजता से जीने की शक्ति और क्षमता देता है।

आपकी ज्यादातर इच्छाएं वास्तव में आपकी नहीं होतीं। आप बस उन्हें अपने सामजिक परिवेश से उठा लेते हैं।

जिम्मेदारी का मतलब है जीवन में आने वाली किसी भी स्थिति का सामना करने में सक्षम होना।

कोई भी काम तनावपूर्ण नहीं है। शरीर, मन और भावनाओं का प्रबन्धन ना कर पाने की आपकी असमर्थता उसे तनावपूर्ण बनाता है।

खोजने का अर्थ है ये स्वीकार करना कि आप नहीं जानते हैं। एक बार जब आप अपनी स्लेट साफ़ कर लेते हैं, सच खुद को उस पर छाप सकता है।

मन को केवल कुछ चीजें ही याद रहती हैं। शरीर को सबकुछ याद रहता है। जो सूचना ये रखता है वो अस्तित्व के प्रारम्भ तक जाती हैं।

पानी की अपनी याददाश्त है। आप इसके साथ कैसे पेश आते हैं, किस तरह के विचार और भावनाएं पैदा करते हैं उसी के अनुसार वो आपके शरीर में व्यवहार करता है।

गप्पें मारना आपके आस-पास के लोगों के साथ एक तरह का मिसअलाइनमेंट है। या तो आप सबके बारे में गप मार सकते हैं, या सबके साथ एक हो सकते हैं।

मेरी कोई राय नहीं होती। केवल जब किसी काम के लिए आवश्यक हो जाता है, मैं कोई निर्णय लेता हूँ। राय आपकी बुद्धि के लिए बेड़ियाँ हैं।

किसी से अटैच होना दुसरे व्यक्ति के बारे में नहीं है। ये आपकी अपनी अपर्याप्तता के बारे में है।

आत्मा, स्वर्ग, या भगवान् के बारे में बात मत करो। किसी ऐसी चीज के बारे में बात करना हो आपके लिए वास्तविकता न हो झूठ के बराबर है।

ईमानदारी एक्शन के बारे में नहीं बल्कि उद्देश्य के बारे में है। क्या आप इसे सबकी भलाई के लिए कर रहे हैं या अपने फायदे के लिए?

कोई भी दो व्यक्ति एक से नहीं हो सकते। आप लोगों की तुलना नहीं कर सकते। आप बस बराबर अवसर दे सकते हैं।

बहुत अधिक प्राप्त कर लेने जैसी कोई चीज नहीं है। जीवन कभी न ख़त्म होने वाली सम्भावना है।

अगर आप अपनी लाइफ उन चीजों में नहीं लगाते जिनकी आप सचमुच फ़िक्र करते हैं तो आपकी लाइफ बर्वाद हो जायेगी। आप उड़ेंगे नहीं – आप लाइफ में बस खुद को घसीटेंगे।

जीवन आपके बाहर नहीं है। आप जीवन हैं।

एक सांप और जीवों से अधिक जानता है कि उसके आस-पास क्या हो रहा है, क्योंकि गप सुनने के लिए उसके पास कान नहीं होते – केवल प्रत्यक्ष अनुभूति।

जीवन में जो भी आपका लक्ष्य हो, जब तक आप उसे पाने की जल्दी नहीं दिखाते, जो करीब हो सकता था वो दूर हो जाएगा।

हर सांस जो आप लेते हैं, आपको मौत के करीब ले जाती है। लेकिन हर सांस जो आप लेते हैं, आप अपनी मुक्ति के करीब भी जा सकते हैं।

जो भी होता है – अंत में, जीवन खुद को सही कर लेता है।

इस ग्रह पर हर दूसरा प्राणी अपना सर्वश्रेष्ठ कर रहा है। केवल मनुष्य ऐसा करने में संकोच करते हैं।

चाहे आप कोई बिजनेस, इंडस्ट्री या देश चला रहे हों – जो चीज चाहिए वो हैं अंतर्दृष्टि, ईमानदारी, और प्रेरणा।

एक इंसान एक बीज की तरह है। या तो आप इसे वैसे रख सकते हैं जैसा वो है, या आप इसे फूलों और फलों से लदे एक अद्भुत पेड़ के रूप में विकसित कर सकते हैं।

भक्ति तब होती है जब जीवन के साथ आपकी भागीदारी इतनी पूर्ण होती है कि आप खुद कोई मायने नहीं रखते।

जब तक आप अपने कष्टों से बेखबर नहीं होते, आपको कोई अधिकार नहीं कि आप दूसरों के कष्टों से बेखबर हों।

 “मैं तुम्हे बदलना चाहता हूँ”- ये क्रांति नहीं है. “ मैं बदलना चाहता हूँ”- अब ये एक क्रांति है।

एक ज़रूरी चीज जो आप अपने बच्चों के लिए कर सकते हैं वो है उन्हें बाहर प्रकृति में ले जाने के लिए कुछ समय देना।

अधिकतर लोग ईगो-सेंसिटिव होते हैं, लाइफ-सेंसिटिव नहीं।

जीवन का अर्थ क्या है? यह इतनी महान घटना है कि इसे किसी अर्थ में नहीं बाँधा जा सकता।

जो कुछ भी निर्मित किया जा सकता है वो पहले से ही सृष्टि में किया जा चुका है। बतौर मनुष्य, हम बस उसकी नक़ल कर सकते हैं, बना नहीं सकते।

ये आपकी क्वालिफिकेशंस नहीं बल्कि लाइफ में मिलने वाला एक्सपोज़र है जो आपको वो बनाता है जो आप हैं।

पेड़ आपकी साँसों के स्रोत हैं- उन्हें काटिए और आप जीवन को ही काट देंगे।

लोग किताबों को पवित्र कहते हैं, लेकिन उन्हें अभी भी ये समझना है कि जीवन पवित्र है।


संपत्ति को अपनी भलाई में बदलने के लिए, आपको आध्यात्मिक तत्व की आवश्यकता होगी। उसके बिना, आपकी सफलता आपके खिलाफ काम करेगी।

Apr 22, 2018

Google Assistant और हिंदी सपोर्ट


Google Assistant ने अब हिंदी में भी समझना शुरू कर दिया है. यह सुविधा उन भारतीय यूज़र के लिए है जिन्होंने अपने एंड्रॉयड डिवाइस में लैंग्वेज़ प्रीफरेंस के तौर पर अंग्रेजी को रखा हुआ है. इस ताजा फैसले के साथ, गूगल अब अमेज़न के एलेक्सा और ऐप्पल के सीरी से एक कदम आगे निकल गया है. बता दें कि ये दोनों वॉयस असिस्टेंट अभी हिंदी भाषा को सपोर्ट नहीं करते. बता दें कि गूगल असिस्टेंट के लिए हिंदी पोर्ट पूरी तरह से नया नहीं है क्योंकि गूगल अलो को दिसंबर, 2016 में हिंदी सपोर्ट मिला था. और गूगल ने पिछले महीने भारत में जियो फोन के लिए हिंदी व अंग्रेजी भाषा के सपोर्ट वाले गूगल असिस्टेंट वर्ज़न को भी प्रदर्शित किया था.

गूगल असिस्टेंट में अभी हिंदी के लिए सपोर्ट सीमित है. आप असिस्टेंट को अपनी कमांड हिंदी में दे सकते हैं. इसके लिए आपको वर्चुअल असिस्टेंट को "Hey Google" या "OK Google" कहकर एक्टिव करना होगा. इसके बाद असिस्टेंट कमांड को अंग्रेजी में ट्रांसक्राइब करेगा लेकिन आपको जवाब हिंदी में मिलेगा. इसके अलावा, गूगल असिस्टेंट से जवाब पाने के लिए आप अपनी हिंदी की पूछताछ को अंग्रेजी में ट्रांसलेट भी कर सकते हैं. परिणाम की उपलब्धता के अनुसार, आपको प्रतिक्रिया हिंदी या अंग्रेजी में मिल जाएगी.

रेड लाइट

लाइफ है तो हम हैं. ख़ुशी है तो गम हैं. कभी कुछ ज्यादा है तो कभी कुछ कम है. धक्-धक् है तो दम है वरना आंखें नम है.

जिंदगी बस ऐसे ही चलती है. हर किसी की ऐसे ही चलती है. ऐसे ही चलेगी. आप उदास मत होइये. देखिये, बिलकुल सीधी बात है. कोई पहाड़ी रास्ता नहीं है जिंदगी. बस सिंपल लाइफ कभी-कभी बोर कर देती है और इसलिए कुछ नया कर लेना चाहता है इंसान. सिर्फ़ इसलिए कि वो ख़ुशी हासिल कर सके. इस ख़ुशी के चक्कर में वो रास्ते बदलता है, नए अनुभव लेता है, कभी रुकता है, कभी ठहरता है और अगली सुबह फ़िर एक नए सफ़र पर निकल पड़ता है. 
ये प्रोसेस पैदा होने से शुरू होता है और मरने तक चलता रहता है. और फ़िर हम निकल लेते हैं. अरबों सालों से अरबों जीवों के साथ ये ही प्रोसेस चलता है और यकीन मानिए, कोई भी इसे रोक नहीं सकता. ये बाय-डिफ़ॉल्ट केस स्टडी है. और बड़ा अनोखा और सिंपल रहस्य. इसलिए लोग लाइट लेते हैं अक्सर? जबकि ये ही मंजिल का रास्ता बनाती है. क्यों?  
कहानी का डायरेक्टर भी कैमरे के सामने नहीं आता. बस वो हमसे एक्टिंग अपनी मर्ज़ी की करवा लेता है. और करना सबको पड़ता है. मरना भी सबको पड़ता है. 
अब कुल मिला के बच गया बीच का टाइम कि क्या करके मरना है? बस ये जिसको समझ आना शुरू हो जाये तो समझो चारों धाम की यात्रा घर बैठे हो गयी. बड़ी कठिन है ये साइंस? कोई 20 की उम्र में, कोई 40 की, कोई 60 की उम्र में थोड़ा – थोड़ा समझने लग जाता है. वक़्त सब समझा देता है. तसल्ली से. इत्मीनान से.
आने का समय तय है. ओके है. क्लियर है? सिम्प्लेस्ट है.
जाने का समय तय है. ओके है. ये भी क्लियर ही है? 4 कंधों का प्रैक्टिकल और राम नाम सत्य. सबने देखा है और बड़े अच्छे से जानते है. हां, मन नहीं मानता. कहता है, मैं थोड़े जाऊंगा? क्यों? हमेशा क्या सिर्फ़ दूसरे ही जायेंगे? मन लफंगा कहीं का.
आने और जाने के बीच में जिन जिन स्टेशन से गुजरना है उसमें हम थोड़ा चुनाव जरुर कर सकते हैं अपनी सुविधानुसार लेकिन हर स्टेशन अपनी पसंद का मिले, ये कदापि जरुरी नहीं. हर स्टेशन को अपना मानना पड़ता है. पसंद नहीं तो कुछ देर बाद स्टेशन बदल भी सकते हैं. पर यात्रा जारी रहेगी क्योंकि रेड लाइट आने तक कारवां गुजरना ही है.
बड़े बड़े राजा-महाराजा, साइंटिस्ट, फिलोस्फेर्स, ज्ञानी, विश्व-विजेता, महारथी, धनवान, रूपवान, स्वस्थ, गरीब, अपंग, शाकाहारी, मांसाहारी, आस्तिक, नास्तिक और हर योनि के जीव......सब आते हैं और चले जाते हैं. सबके अलग अलग स्टेशन तय हो जाते हैं. जीने के माध्यम और उद्देश्य क्लियर हो जाते हैं, डिफाइन हो जाते हैं. अब वो जीवन को किस रूप में देखेंगे, ये सबका पर्सनल मसला बनने लगता है और यहीं से शुरू होती है स्टेशन पर फाइट. समझ-समझ का अंतर सिंपल चीज़ों को उलझाने लगता है और छिपा हुआ डायरेक्टर अपने एक्टर्स की अवार्ड-विनिंग एक्टिंग देख कर उनके लिए मनमाफिक मोमेंटो खोजने निकल पड़ता है. 
छोटे से बड़े, हर आदमी की छाप उसके जाने के बाद एक स्टाम्प की तरह चिपकी रह जाती है और इतने में ग्रीन लाइट का समय ख़त्म होने लगता है. येलो लाइट जगमगाने लगती है ये इंडिकेशन देते हुए कि रेड लाइट बस करीब है. लास्ट स्टेशन जब आएगा तो उतरना हो होगा. सबको. आज नहीं तो कल.
बस इतना करते चलिए कि अंतिम रेड लाइट से पहले कोई मलाल न रह जाए. और सिर्फ़ पैसे का दुःख मत मनाइये. ये मलाल का विषय कभी था ही नहीं. ना ही कभी होगा.
ये समझने का विषय है कि आने-जाने, स्टेशन पर रात बिताने और रेड लाइट के छा जाने तक आपके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या रहा होगा? बस ये ही आपके अगले अनजाने सफ़र की स्क्रिप्ट का आधार बनेगी.



“कितना अच्छा होता कि तुम अगर सुंदर भी होते.“

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा-
“कितना अच्छा होता कि तुम अगर सुंदर भी होते.“
चाणक्य ने उत्तर दिया, "महाराज सुन्दरता तो मृगतृष्णा है. आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती हैसुन्दरता से नहीं.“
“क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहाँ गुण के सामने सुन्दरता फीकी दिखे. चंद्रगुप्त ने पूछा?
"ऐसे तो कई उदाहरण हैं महाराज, चाणक्य ने कहा, "पहले आप पानी पीकर मन को हल्का करें, बाद में बात करेंगे."
"महाराज पहले गिलास का पानी इस सोने के घड़े का था और दूसरे गिलास का पानी काली मिट्टी की उस मटकी का था.
अब आप बताएँ, किस गिलास का पानी आपको मीठा और स्वादिष्ट लगा?"
सम्राट ने जवाब दिया- "मटकी से भरे गिलास का पानी शीतल और मीठा लगा एवं उससे मन को तसल्ली भी मिली."

वहाँ उपस्थित महारानी ने मुस्कुराकर कहा, "महाराज हमारे प्रधानमंत्री ने बुद्धिचातुर्य से प्रश्न का उत्तर दे दिया. भला यह सोने का सुंदर घड़ा किस काम का, जिसका पानी बेस्वाद लगता है. दूसरी ओर काली मिट्टी से बनी यह मटकी, जो सुंदर तो नहीं है, लेकिन उसमें गुण छिपे हैं. उसका शीतल मीठा पानी पीकर मन तृप्त हो जाता है. 
अब आप ही बतला दें कि सुन्दरता बड़ी है अथवा गुण एवं बुद्धि?"


Apr 20, 2018

तो मुझे अकेलापन महसूस होने लगता है. मुझे क्या करना चाहिए?




उत्तर: मैं आपको एक बात समझाना चाहता हूं। आप खुद को जितना अकेला समझेंगे, खुद को जितना निराश महसूस करेंगे, उतना ही आपको लोगों के साथ की जरूरत महसूस होगी। लेकिन आप जितना खुश होंगे, आप भीतर से जितना उल्लासित और उत्साहित महसूस करेंगे, आपको लोगों के साथ की जरूरत उतनी ही कम महसूस होगी। इसलिए जब आप खुद के साथ हैं और तब आप अकेलापन महसूस करते हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि आप एक खराब संगत में हैं। अगर आप एक अच्छे इंसान की संगत में हैं तो आप अकेलापन कैसे महसूस कर सकते हैं? तब तो आपको बहुत अच्छा और विशिष्ट महसूस करना चाहिए। आपके उल्लास को पैदा नहीं किया सकता। अगर यह ओढ़ा हुआ या कृत्रिम रूप से बनाया हुआ उल्लास है तो बेशक आपको लोगों के साथ की जरूरत महसूस हो सकती है। अकसर लोग उल्लास या आनंद का मतलब समझते हैं – संगीत सुनना, नाचना और झूमना। आनंद के लिए ये सब करना बिल्कुल जरूरी नहीं है। आप चुपचाप एक जगह शांति से बैठकर भी पूरी तरह से आनंद और उल्लास को अपने भीतर महसूस कर सकते हैं।

आनंदित होकर काम करें, या फिर आनंद पाने के लिए काम
इस एक अंतर को समझना होगा कि अगर आप अपने स्वभाव से ही आनंदित रहने वाले इंसान हैं, या आपका जीवन आनंदमय हो गया है तो आपका काम बस उसका एक परिणाम भर होता है। लेकिन कई बार आपका जीवन उल्लासपूर्ण नहीं होता, बल्कि आप कुछ गतिविधियों की मदद से इसे उल्लासपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं।

असलियत तो यह है कि जब पौधे अपने भीतर ऊर्जा या उल्लास को संभाल नहीं पाते तो वह फूलों के रूप में उसे व्यक्त कर देते हैं। जीवन भी इसी तरह होना चाहिए।
इन दोनों स्थितियों में एक बड़ा फर्क है। एक में आप नृत्य करके आनंद की स्थिति में पहुंचते हैं जबकि दूसरी में आप आनंद से भरे होते हैं और उस आनंद को संभाल न पाने के कारण आप नाचने लगते हैं। ये दोनों चीजें अलग-अलग हैं। या तो आपके भीतर की खुशी से आपकी हंसी फूट पड़ती है या फिर किसी ने आपसे कहा होता है कि अगर हर सुबह उठकर आप हंसेंगे तो एक दिन आपको खुशी मिल जाएगी। ये दो अलग-अलग तरीके हैं। अब आप अपने चारों तरफ नजर दौड़ाइए और देखिए कि जीवन कैसे चलता है।

क्या ऐसा होता है कि फूलों को जब खिलना होता है, तो उन्हें सहारा देने के लिए पौधे और उसकी जड़ें उगती हैं? क्या कभी ऐसा होता है? हां कुछ और हालत में ऐसा होता है, जैसे माइक्रोफोन के साथ ऐसा है। पहले माइक्रोफोन बना, फिर बोलने वाले को तकलीफ नहीं हो, इसलिए स्टैंड बनाया गया जो एक तने जैसा है। क्या ऐसा ही फूलों के साथ भी है कि उनके खिलने के बाद तने उन्हें सहारा देने के लिए निकल आते हैं? असलियत तो यह है कि जब पौधे अपने भीतर ऊर्जा या उल्लास को संभाल नहीं पाते तो वह फूलों के रूप में उसे व्यक्त कर देते हैं। जीवन भी इसी तरह होना चाहिए। अगर आपने दूसरे तरह से जीने की कोशिश की तो जीवन बड़ा मुश्किल हो जाएगा।

बनावटी ख़ुशी से जीवन मुश्किल हो जाएगा
इस दुनिया में सबसे मुश्किल जीवन वह है, जो खुश न होने पर भी लगातार यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह बेहद खुश है। इस तरह का दिखावा करने में बहुत बड़ी मात्रा में जीवन ऊर्जा लगती है। क्या आपने कभी इस पर गौर किया है? दुनिया में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वाकई खुश होने पर तो खुश दिखते हैं, पर जब वो दुखी होते हैं तो दुखी दिखाई देते हैं। ऐसे लोग असलियत में जैसे हैं, वैसे ही दिखाई देते हैं। पूरी दुनिया उनकी इस जीवन-शैली के बारे में जानती है। जबकि कुछ लोग पूरे समय बनावटी हंसी और खुशी बनाए रखते हैं जिसमें उन्हें जबरदस्त उर्जा खर्च करनी पड़ती है। मैं आपको बता दूं कि इससे शरीर के अंदर कई रोग और तकलीफें पैदा हो जाती हैं। इससे आपके शरीर में गांठ और ट्यूमर बन सकता है। आज पूरी दुनिया में ऐसा ही हो रहा है।

आप जिस तरफ  भी जाना चाहते हैं, वह आप तय कर लीजिए। इसका फैसला मैं नहीं कर रहा। लेकिन जहां भी जाना है, उस दिशा में नियमित रूप से लगातार बढ़िए।
अगर आपमें से कोई तैयार हो तो मैं उस पर यह प्रयोग करके भी दिखा सकता हूं। कुछ ही घंटों में, मैं आप ही के द्वारा आपके शरीर में ट्यूमर पैदा करवा सकता हूं। वाकई, मैं मजाक नहीं कर रहा हूं। अगर आप अपने मन को किसी खास दिशा में ढाल लेते हैं, तो आप यह कर सकते हैं। लेकिन सौभाग्य की बात यह है कि आप कोई भी काम लगातार नहीं करते, जिसकी वजह से आप बच जाते हैं। आप कभी खुश होते हैं, कभी नहीं, इसी तरह से आप कभी दुखी होते हैं तो कभी नहीं। कोई भी भाव लगातार नहीं बना रहता। अगर आप गंभीर रूप से लगातार दुखी रहते हैं तो आप उसके नतीजे देख सकते हैं। इसी तरह से अगर आप लगातार खुश रहते हैं तो उसके नतीजे भी देख सकते हैं। अगर आप हमेशा बुरी तरह से गुस्से में रहते हैं, तो उसका भी एक खास नतीजा होगा। आपको किसी भी चीज के पूरे नतीजे इसलिए नहीं मिलते, क्योंकि आपकी भावनाओं की तीव्रता लगातार घटती बढ़ती रहती है।

बार-बार अपनी दिशा न बदलें
लोग अकसर मुझसे सवाल करते हैं कि सद्‌गुरु हमें किस तरह का रवैया और अपनी भावनाएं रखनी चाहिए। इस पर मेरा जवाब होता है कि ‘हर भाव, हर रवैया अच्छा है।’ अगर आप गुस्सा करना चाहते हैं तो चौबीस घंटे बिना रुके लगातार गुस्सा कीजिए। आपको खुद-ब-खुद आत्मानुभूति हो जाएगी। वाकई मैं मजाक नहीं कर रहा। अगर आपको प्रेम करना पसंद है, तो चौबीसों घंटे प्रेम कीजिए। आपको अनुभूति हो जाएगी। आप जो भी कर रहे हैं, उसे लगातार चौबीस घंटे कीजिए और फिर देखिए आपको एक खास तरह की अनुभूति होगी। चीजें बस ऐसे ही घटित होती हैं।

इस सृष्टि का कण-कण, हर एक कोशिका, हर एक परमाणु,आपके लिए अस्तित्व से परे जाने का द्वार बन सकते हैं, अगर आप लगातार एक दिशा में चलें, एक भाव में रहें। लेकिन दिक्कत यह है कि लोग लगातार अपनी दिशा और दशा बदलते रहते हैं। यह आज के दौर की इतनी बड़ी समस्या है, जितनी पहले नहीं थी। लोग ऐसा कहने में अपनी तारीफ समझते हैं कि ‘मेरी एकाग्रता की अवधि बहुत छोटी है।’ अगर आप अपना फोकस लगातार बदलते रहेंगे तो इससे कुछ होने वाला नहीं। आप जिस तरफ भी जाना चाहते हैं, वह आप तय कर लीजिए। इसका फैसला मैं नहीं कर रहा। लेकिन जहां भी जाना है, उस दिशा में नियमित रूप से लगातार बढ़िए। आप रोज-रोज अपनी दिशा मत बदलिए।

ईशा.सद्गुरु.ओ.आर.जी. से साभार.

Apr 19, 2018

उसके पिता एक होटल में शेफ़ थे.



एक दिन एक छोटी सी लड़की अपने पिता को दुख व्यक्त करते-करते अपने जीवन को कोसते हुए यह बता रही थी कि उसका जीवन बहुत ही मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. उसके जीवन में एक दुख का समय जाता है तो दूसरा चला आ रहा है और वह इन मुश्किलों से लड़ लड़ कर अब थक चुकी है. वह करे तो क्या करे?

उसके पिता प्रोफेशन से एक होटल में शेफ़ थे. अपनी बेटी के इन शब्दों को सुनने के बाद वह अपनी बेटी को रसोईघर में ले गए और 3 बर्तनों में पानी डाल कर गैस पर रख दिया. जैसे ही पानी गरम हो कर उबलने लगा, पिता नें पहले बर्तन में एक आलू डाला, दूसरे में एक अंडा और तीसरे में कुछ कॉफ़ी बीन्स डाल दिए.

वह लड़की बिना कोई प्रश्न किये अपने पिता के इस काम को ध्यान से देख रही थी.
कुछ 20-25 मिनट के बाद उन्होंने गैस को बंद कर दिया और फ़िर एक कटोरे में आलू, दूसरे में अंडे और तीसरे कटोरे में कॉफ़ी बीन्स वाले पानी को रख दिया. पिता ने बेटी की तरफ उन तीनों कटोरों को दिखाते हुए गहरी आवाज़ में एक साथ कहा. ये देखो - आलू, अंडे, और कॉफ़ी बीन्स.

पिता ने दोबारा बताते हुए बेटी से कहा. मेरी प्यारी बेटी, तुम इन तीनों चीजों को करीब से देखो.

बेटी ने आलू को देखा जो उबलने के कारण मुलायम हो गया था. फ़िर उसके बाद अंडे को देखा जो उबलने के बाद पत्थर जैसा हो गया था. और जब लड़की ने कॉफ़ी बीन्स को देखा तो उस पानी से बहुत ही अच्छी खुशबु आ रही थी.

पिता ने बेटी से पूछा - क्या तुमको पता चला इन सब का मतलब क्या है?
बेटी ने कहा- नहीं, पापा.

तब उसके पिता ने समझाते हुए कहा कि इन तीनो चीजों यानि आलू, अंडे और कॉफ़ी बीन्स ने अलग अलग व्यवहार दिखाया लेकिन जो मुश्किल उन्होंने झेली, वो तो एक जैसी ही थी.

बेटी को बात समझ आ गयी. उसके बाद पिता ने अपनी बेटी से एक प्रश्न पूछा.
प्रश्न था कि जब कभी कोई विपरीत परिस्थिति तुम्हारे जीवन में आती है या भविष्य में आये तो तुम क्या बनना चाहोगी?  आलू, अंडा या कॉफ़ी बीन्स?
बेटी को अपनी परेशानियों का हल मिलना शुरू हो गया था. उसने जान लिया था कि उसकी नेचर और सोच ही उसकी हालत के लिए ज़िम्मेदार है. परिस्थितियाँ तो सबके लिए ही एक जैसी ही होती हैं.

सार
जीवन में मुसीबतें चाहें कैसी भी हो, पर यह उस आदमी के ऊपर है कि वह उनको कितना झेलने की ताकत रख पाता है. टूटने से बचने का क्या कोई और उपाय है?
सोच बदलिए, मुसीबतें कामयाबी में बदल जायेंगी.

क्या पता उसके दर्द की दास्तां हमारी उम्र से भी बड़ी हो?

एक बार एक 30 साल का लड़का और उसका पिता ट्रेन में सफ़र कर रहे थे. वह लड़का बार-बार ट्रेन की खिड़की से झाँक रहा था और बाहर दिखते हुए पेड़ पौधों और प्रकृति के नजारों को देखकर जोर-जोर से चिल्ला रहा था और ख़ुशी के एहसास से पागल हो रहा था.


पास ही में एक नया-नवेला शादीशुदा जोड़ा बैठा था और उस लड़के को देखकर उन्हें हंसी आये जा रही थी.

तभी उस लड़के के पिता ने अपने बेटे से कहा - देखो बेटा, बाहर आसमान में बादलों को देखो. वो भी हमारे साथ दौड़ लगा रहें हैं. 

यह पागलपन देखकर उस शादीशुदा जोड़े को सहन नहीं हुआ और वह उस लड़के के पिता से बोल बैठे कि आप अपने बेटे को किसी डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाते? अगर ये ऐसे ही पागलों की तरह करता रहा तो हमारे हनीमून का सफ़र तो बिलकुल ही बेकार हो जायेगा.

यह सुनकर उस लड़के के पिता ने उत्तर दिया - हम डॉक्टर के पास से ही आ रहे हैं. दरअसल मेरा बेटा जन्म के समय से ही देख नहीं सकता था पर आज हुए उसके आँखों के सफल ऑपरेशन के कारण ही वह ये सब पहली बार देख पा रहा है और वह बहुत खुश है. बस इसलिए मैं उसकी ख़ुशी को पंख देने की कोशिश कर रहा था.

उस शादीशुदा जोड़े के पास अब कुछ कहने हो नहीं बचा था.

सारांश:
इस धरती पर हर किसी आदमी के जीवन की अपनी एक कहानी है. हमें किसी भी व्यक्ति के विषय में पूरी जानकारी न होने पर उसके विषय में कमेंट सिर्फ़ इसलिए नहीं कर देना चाहिये क्योंकि हमें तकलीफ़ महसूस हो रही है. क्या पता उसके दर्द की दास्तां हमारी उम्र से भी बड़ी हो?


Apr 17, 2018

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सुनील किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा. सुनील ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया. अब फाइनल इंटरव्यू कंपनी के डायरेक्टर को लेना था. और डायरेक्टर को ही तय करना था कि सुनील को नौकरी पर रखा जाए या नहीं?


डायरेक्टर ने सुनील का बायोडाटा देखा और पाया कि पढ़ाई के साथ- साथ सुनील Extra-Curricular Activities में भी हमेशा अव्वल रहा.

डायरेक्टर- "क्या तुम्हें पढ़ाई के दौरान कभी scholarship मिली है?"
सुनील - "जी नहीं"
डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे."
सुनील - "जी हां, सर."
डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी क्या काम करते हैं?"
सुनील - "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं."
यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा - "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना."
सुनील के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे.
डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी कपड़े धोने में अपने पिताजी की मदद की है?"
सुनील - "नहीं सर, मेरे पिता जी हमेशा यही चाहते थे कि मैं पढ़ाई करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें पढ़ूं. और हां सर, एक बात और.. मेरे पिता जी बड़ी तेजी से कपड़े धोते हैं."
डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें एक काम करने के लिए कह सकता हूं?"
सुनील - "जी, आदेश कीजिए."
डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना और फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना."

सुनील यह सुनकर प्रसन्न हो गया. उसे लगा कि अब नौकरी मिलना तो पक्का है. तभी तो डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है.
सुनील ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा.

पिता को थोड़ी हैरानी हुई. फिर भी उसने बेटे की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके हाथों में दे दिए. सुनील ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया. साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे. उसके पिता के हाथ रेगमाल पेपर की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे. यहां तक कि जब भी वह कटे के निशानों पर पानी डालता, चुभन का अहसास पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था.
सुनील को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे. पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक कामयाबी का. पिता के हाथ धोने के बाद सुनील को पता ही नहीं चला कि उसने उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले. उसके पिता रोकते ही रह गए, लेकिन सुनील अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया.

उस रात बाप - बेटे ने काफ़ी देर तक बातें की.

अगली सुबह सुनील फिर नौकरी के लिए कंपनी के डायरेक्टर के ऑफिस में था. डायरेक्टर का सामना करते हुए सुनील की आंखें गीली थीं.

डायरेक्टर- "हूं, तो फिर कैसा रहा कल घर पर सुनील? क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे?"
सुनील - " जी हाँ, सर कल मैंने जिंदगी के कुछ वास्तविक अनुभवों को सीखा और महसूस किया.
पहला : मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है? मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतना आगे नहीं आ सकता था.
दूसरा :  पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है?
तीसरा : मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार इतनी शिद्दत के साथ महसूस की.
डायरेक्टर- " सुनील, ये ही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं. मैं यह नौकरी केवल उसे देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे. ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे. ऐसा शख्स जिसने सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो.
मुबारक हो सुनील, तुम इस नौकरी के पूरे हक़दार हो."

सारांश
आप अपने बच्चों को बड़ा घर दें. बढ़िया खाना दें. बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें. लेकिन साथ ही अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि कोई भी काम करते हुए कैसा लगता है? उन्हें भी अपने हाथों से वो काम करने दें. खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें. ऐसा इसलिए नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते, बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही और सच्चा प्यार करते हैं. आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं.

सबसे अहम हैं कि आपके बच्चे किसी काम को करने की कोशिश की कद्र करना सीखें. एक दूसरे का हाथ बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर लाएं.
और यकीन मानिए....कोशिशें कामयाब होती हैं. ईमानदार कोशिशें.