Nov 19, 2019

आप दूध में गोबर मिलाकर, मक्खन नहीं निकाल सकते.





सभी चीज़ों के मूल में एनर्जी है.
अस्तित्व का हर कण जिंदा है तो सिर्फ़ 
इसीलिए कि उसमें एक्टिव एनर्जी है.

आपको बस उस एनर्जी को डायरेक्शन 
देने की रेस्पोंसिबिलिटी लेनी है
और अगर आप ऐसा करते हैं तो
कई नयी चीज़ें घटती हैं.

दिमाग का गार्बेज कलेक्शन कम हो सकता है.
मन में घूम रहे काल्पनिक विचारों से रियलिटी की
तस्वीर खूबसूरत बनने की
उम्मीदें जाग सकती हैं.
आप अस्तित्व को और अधिक क्लैरिटी और
नेचुरल तरीके से देख पाने की
काबिलियत को हासिल कर सकते हैं.

देखिए,
ये बड़ी सीधी और सरल बात है कि
चीज़ों को सही तरीके से करने से ही 
सही रिजल्ट आएंगे.
आप दूध में गोबर मिलाकर मक्खन 
नहीं निकाल सकते,
चाहे आप कितनी भी उम्र के क्यों ना हो.
मक्खन निकालने की सही तकनीक से ही
आपको वो मिल सकता है.

ठीक उसी तरह अपनी एनर्जी को सही तकनीक
का सहारा देने भर से
आप समाधान के रास्ते पकड़ सकते हैं
और मंजिल के करीब पहुँच सकते है,
वरना लाइफ़ आपको पका-पका के थका सकती है
और ये बड़ा दर्दनाक सफ़र बन जाता है.

इसीलिए
अपने प्रॉफिट के लिए,
समझदारी के रसगुल्ले खाने के लिए,
कभी-कभी मुस्कुराने के लिए,
कुछ गुनगुनाने के लिए,
आपको कभी कभी अपनी एनर्जी को शरीर से
ऊँचा उठा कर देखने की कोशिश
करते रहना चाहिए.

जो सब कहते हैं या जो सब कर रहे हैं,
वैसा मत कीजिए.
कॉपी-पेस्ट से किसी को कुछ नहीं मिल सका है.

वो कीजिए, जो आपसे सहज भाव से हो जाए.
बस इतना ही कि आपको करने में दुःख ना हो
और आपके इतना कर देने से आस-पास 
भी दुःख ना घटे.
ये ही एनर्जी को सही दिशा में ढ़लने 
की और ले जाएगा.

कम या ज्यादा होने की चिंता में मत डूबिये.
सही या गलत की वर्णमाला को रटने 
की फ़िक्र से आज़ाद होइए.

क्या हुआ या क्या होगा?
इस डर को कुछ पलों के लिए ही सही,
मगर जला डालिए.

कुछ समय बाद,
आप देखेंगे
कि आपकी जो भी जरूरतें हैं,
वो खुद-ब-खुद पूरी होंगी,
बस आपको अपनी एनर्जी को एक्टिव और
फोकस्ड मोड में चलाए रखना है,
कर्मों और प्रार्थना, दोनों में ही.

उसके बाद आपको कुछ भी कल्पना करने से मुक्ति है.

चीज़ें अपने आप ऐसे घटित होंगी जैसे
कृपा की नदियाँ बह रही हों.
और ये सबसे बड़ा प्रैक्टिकल एक्सपेरिमेंट है
जो मनुष्य जीवन में होना ही चाहिए,
अंतिम सांस के आने से पहले.

अब अस्तित्व आपको सबकुछ देने के लिए
अपनी इच्छा जाहिर करता है.
इसे आप सौभाग्यशाली होना भी कह सकते हैं.
हर कोई ये ही इच्छा करता है.
अब इसे पूरा करने का समय है.

और याद रखिए कि
दुर्घटना से देर भली.


इमेज सोर्स: गूगल

Nov 14, 2019

आइंस्टीन Vs डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह - एक योद्धा का मानसिक संघर्ष.





आइंस्टीन को हर भारतीय बड़े ही 
रेस्पेक्ट्फुल तरीके से देखता है
क्योंकि उनकी रिसर्च और उपलब्धियों को 
सबने पढ़ा या सुना है.
मगर
बिहार में जन्में डॉक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह का 
नाम कुछ हो लोगों ने सुना है
और आज की पीढ़ी को पता होना ही चाहिए कि  
डॉक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह ऐसे 
शानदार मैथमेटिक्स साइंटिस्ट रहे हैं कि
कि उन्होंने आइंस्टीन की रिलेटिव थ्योरी को 
चैलेंज ही नहीं किया था
बल्कि उसके प्रमाण के लिए बेहतरीन
साइंटिफिक एनालिसिस भी प्रस्तुत किया था.

एक और बात जो बड़ी फेमस है डॉक्टर साहब 
के बारें में,
वो ये है कि जब नासा, अपोलो की लॉचिंग कर रहा था तो उसके
31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए थे.
हैरानी की बात ये है कि जब वो कंप्यूटर 
दोबारा वर्किंग में आए तो
डॉक्टर साहब और उन कंप्यूटर की 
कैलकुलेशन बिलकुल एक जैसी थी.
एक लिविंग जीनियस होने का इससे 
बड़ा सबूत क्या हो सकता है?

जब वो पटना साइंस कॉलेज में पढ़ रहे थे,
उस दौरान कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के 
प्रोफेसर जॉन एल. केली ने
उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अमरीका ले गये.
1969 में केली के मार्गदर्शन में ही डॉक्टर सिंह ने
'साइकल वेक्टर स्पेस थ्योरीविषय पर 
अपनी पीएचडी पूरी की.

फिर वो वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में 
असिस्टेंट प्रोफेसर बने.
अमेरिका के नासा में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी.
उसके बाद वो भारत लौट आए और
1971 में आईआईटी, कानपुर में टीचिंग करने लगे.
केवल 8 महीने बाद ही उन्होंने यहां से 
रिजाइन दे दिया
और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई में काम करने लगे.
1973 में उनकी शादी वंदना रानी सिंह के साथ हुई.

1974 में उन्हें भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई), कोलकाता में
स्थाई प्रोफेसर पद पर नियुक्ति मिली.

इसी साल अचानक उन्हें मानसिक कही जाने 
वाली एक बीमारी,
सिजेफ्रेनिया का पहला दौरा पड़ा.
इलाज चलने लगा लेकिन
डॉक्टर सिंह की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ने लगी.
बीमारी के कारण उनका व्यवहार भी बदलने लगा.
इसी वजह से, उनके साथ-साथ उनसे जुड़े
परिजन भी उदास और हताश होने लगे.
आर्थिक तंगी ने जीवन को और दर्द दे दिया.
डॉक्टर सिंह गुमनामी के अँधेरे में खोने लगे.
बताया जाता है कि उनकी पत्नी को भी 
तंग-हार कर उनसे दूर होना पड़ा.
एक महान गणितज्ञ से ऐसी 
मानसिक बीमारी के प्रकोप का शिकार हो जाना
और फ़िर जीवन के अंतिम क्षणों तक
लाचारी और बेबसी.
अपने अंतिम दिनों में वो अपने भाई के
पटना स्थित फ्लैट में ख़ुद को गुजारते रहे
और उनके बेस्ट फ्रेंड थे – किताब, कॉपी और पेंसिल.
44 साल तक सिजेफ्रेनिया से लड़ने के बाद
आखिरकार उन्हें जाना पड़ा.

आज सब उनके बारें में जानने को बेहद 
उत्सुक दिखते हैं,
लेकिन जब उन्हें ज़रूरत रही होगी,
तब उनके पास कौन रहा होगा?
लोकतंत्र, राजतंत्र या सामाजिक तंत्र?
ये इंसानी सवाल है.


भारत निश्चित ही एक शानदार देश है.
प्रतिभाओं और जीनियस लोगों से भरा देश.

यहां चढ़ते सूरज को पूरा सलाम है
उससे पूरी धूप लेनी है,
लेकिन उतरते सूरज की देखभाल के लिए
ज़रूरी इच्छाशक्ति की कमी साफ़ झलकती है.
बस यहीं जीवन दम तोड़ देता है.

युवा पीढ़ी को इसे सहेज कर रखने का 
स्वभाव बनना होगा
वरना यहां सांस लेने वाले मुर्दे ही मुस्कुराते मिलेंगे,
आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस को अपनाते हुए.

बायोपिक बनते रहेंगे.
एंटरटेनमेंट होता रहेगा.

सच-सच बताना?
आपको कैसे लोग पसंद हैं?


इमेज एंड इंफो सोर्स: गूगल




Nov 13, 2019

जीवन की ट्रेन ऐसे ही दौड़ती है. हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे.





आप किसी भी ऐज ग्रुप के हों,
अगर आप कभी-कभी ये महसूस कर पाते हैं 
कि आपके अंदर का बंदर यानि आपका बचपना
कुछ ही पलों के लिए ही सही,
मगर बदमाशी करता रहता है
तो आप भी बाल दिवस मना सकते हैं.
और इसे हर किसी को मनाना ही चाहिए
क्योंकि डेड सीरियस होकर ही 
आप चीज़ों को बदल देंगे
या उनका आनंद उठा सकेंगे,
इसमें संदेह हो सकता है.

लेकिन एक बच्चे की तरह कुछ पल गुजार कर,
शायद आप अपने अस्तित्व के
गोल्डन पीरियड को पुर्नजीवित ज़रूर कर सकते हैं.
और इसमें जरा भी झूठा होने ही गुंजाईश नहीं है.

हर कोई अपने किसी कोने में बचपन को 
जिंदा रखना ही चाहता है
क्योंकि उसमें हैरानी है, नया करने का जोश है,
हार की परवाह नहीं है और
सबकुछ स्वीकारने का ज़ज्बा बना रहता है.

थोड़ा बड़ा हो जाने पर सिर्फ़ उम्र बढ़ जाती है,
आप छोटे और उदासीन होते चलते हैं.
जीवन आपको घसीटता हुआ आगे ले जाता है,
मन की चिंताएं सूरज से भी बड़ी दिखाई देती हैं
और जीवन चलाने का डर हमेशा घर किये रहता है.

आप लक्ष्य बनाते हैं, प्लानिंग करते हैं,
बाहरी ताम-झाम से अपनी बोझिल लाइफ़-स्टाइल को
नया लुक देने की ब्रांडिंग में सिमटते जाते हैं
और अपने आस-पास अपनी सपोर्ट का
एक आर्टिफीसियल वायु-मंडल क्रिएट 
करने की कोशिशों में
चेहरे की झुर्रियां बढ़ाते चलते हैं.

लेकिन किसी शाम को,
बिस्तर पर पड़ते ही आपको
बचपन के दिन अचानक से याद आते हैं
और आप बिना किसी बाहरी मदद के 
भी मुस्कुरा पड़ते है.
अब आप चारों तरफ़ देखते हैं और पाते हैं
कि इतना सबकुछ किसलिए?
लेकिन प्रैक्टिकल बनना ज़रूरी है,
इसीलिए यादों का बंडल फेंक दिया जाता है.

कुछ दिनों बाद बुढ़ापा दस्तक देने लगता है.
जिस मान-सम्मान, इज्ज़त, शोहरत के लिए आप
मिल्खा सिंह की तरह दौड़े थे, वो अतीत बन चुका है.
आपके बच्चे बड़े होकर अब बोल्ट की तरह 
दौड़ने की फ़िराक में हैं
और उन्हें आपके अस्तित्व से कुछ 
ज्यादा उम्मीदें नहीं है.
ये ठीक वैसा ही एक्सपीरियंस है,
जो कभी आपको भी बड़ा होते हुए हुआ होगा.

जीवन की ट्रेन ऐसे ही दौड़ती है.
आपको अपनी छुक-छुक याद करते रहना चाहिए.
क्योंकि आपका अपना अनुभव, ख़ुद अपने लिए,
बस ये ही सबसे बड़ी कृपा है
जिससे आप अपने आस-पास से जुड़ते हैं
और बचपन छलांगे मारता रहता है.

हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे.
आज किसी बच्चे को हंसा कर देखिए.
और ये दिन आपका ही होगा.



इमेज सोर्स: गूगल