Mar 20, 2020

साहब भी पूरे सोशल थे.





समय के साथ, 
हर चीज़ प्रभावित करती चलती है.
कोई लाख़ समझाए,
लेकिन समझ तभी आता है,
जब ख़ुद के अनुभव में, कोई चीज़ आए.

उससे पहले तक, अटकलें, इफ्स और बट्स,
साइकोलॉजिकल एक्सरसाइज तो चल सकती हैं,
तसल्ली, ख़ुद के साथ, 
कुछ बीतने पर ही हो पाती है.

इसलिए कोई भी सच जानना हो,
तो उसके अनुभव से, ख़ुद को, गुजरना ही होगा.
दूर से देखने पर ही, सच दिखाई देने लगे तो
कोई झूठ बोले ही क्यों?

दूसरों के अनुभवों का फ़ायदा, लिया जा सकता है,
उनका इस्तेमाल, सही दिशा में चलने के लिए,
आपको उत्सुक कर सकता है,
चलना मगर आपको, पहले पड़ेगा.


एक बार की बात है.
किसी देश के प्रधानमंत्री के लिए,
उनकी सरकार के ही एक मंत्री,
कुछ आम लेकर आए.
मंत्री चाहते थे कि साहब,
ये मीठे और हर्बल आम खाएं और
इसके स्वाद का आनंद लें.

साहब भी पूरे सोशल थे.
बोले – पहले, आप पूरे मंत्रिमंडल को आम चखाइए
और स्वाद बताइए कि कैसा है?
सबने एक-एक आम पिक किया और खाया.
अपने-अपने स्वाद के अनुभव साहब को बताए,
लेकिन साहब को आम के स्वाद के बारें में,
कुछ ख़ास समझ नहीं आ सका.

ये ठीक वैसा ही था कि कोई प्रोजेक्ट लीडर,
जिसने ख़ुद कभी कोई प्रेजेंटेशन ना दी हो और
औरों की प्रेजेंटेशन देख कर, उनकी प्रोग्रेस का एनालिसिस करे.

रिजल्ट अच्छे आने के चांस, कम तो होंगे ही.

खैर,
फ़िर साहब ने,
अपने सबसे ख़ास और 
बुद्धिमान मिनिस्टर को तलब किया
ताकि वो आम के स्वाद की 
रियल फीलिंग जान सके.

ये मिनिस्टर, दूसरों से थोड़ा अलग निकला.
उसने एक प्लेट और चक्कू मंगवाया.
आम काटा और साहब के सामने रख दिया.
फ़िर कहा, एक टुकड़ा खा कर देखिए.

साहब ने आम चखा और कहा –
वाह. बेहद स्वादिष्ट, कमाल का मीठा फल है.
साहब ने जब पूरा आम, लपेट दिया,
तब मीटिंग लेते हुए बोले कि
अब मुझे समझ आया है कि, 
आम होता क्या है?

मिनिस्टर ने जवाब दिया कि
जनाब, अगर आप ये आम, 
ख़ुद खाकर ना देखते तो
आपको कभी भी, 
इसकी असली मिठास का पता, 
शायद ही चल पाता
और तब तक आप, 
सिर्फ़ अपनी एक राय बना कर रखते चलते,
जो 100% ग़लत होती.
साहब बोले – बिलकुल सही फ़रमाया.

तो ठीक इसी तरह,
सभी को अपनी पहली प्रेफरेंस,
अपने अनुभव को देनी चाहिए
और फ़िर दूसरों की सीख और गाइडेंस को,
उसमें जोड़ देना चाहिए.
तब, काम मजबूत हो जाता है.
जैसे फेविकोल का मजबूत जोड़.
फ़िर इसके टूटने के चांस, 
बेहद कम होंगे.



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Mar 16, 2020

आप, शर्त लगाते हैं, किसी और की. किसी और के सामने.





शर्ते,
बहुत शरारती एलिमेंट हैं.

आप, कोई भी शर्त लगाते हैं और हार जाते हैं
क्योंकि, किसी भी शर्त में, 
जीतने के गारंटी वाला पैकेज कभी रहा ही नहीं.
ना कल, ना आज और ना ही परसों.

एक बात और,
कि जब भी आप, शर्त लगाते हैं,
तो किसी और की, लगा देते हैं,
वो भी, किसी और के सामने.

आप, अपनी शर्त, कभी नहीं लगाते.
बस, इसी में, संभावना छुपी हुई है.

जिस दिन आप, अपनी शर्त लगा देंगे,
ख़ुद को संकट में डाल देंगे,
ख़ुद को न्योछावर कर देंगे,
ख़ुद की बलि दे देंगे,
ख़ुद की टेस्टिंग कर लेंगे,
ख़ुद का एनालिसिस करना, स्टार्ट कर देंगे,
तब शायद, जीत का कोई चांस निकल सकता है.

फ़िलहाल, 
जब तक आप दूसरों की टोपियां घूमा रहे हैं,
दूसरों की बातों को,
अपने दिमाग की कटोरी में रख के,
पिए जा रहे हैं,
दूसरों को संकट में डाल रहे हैं,
दूसरों को स्वाहा करने की ख़ूबी लिए, टहल रहे हैं,
दूसरों के एनालिसिस में बिजी हैं,
तो आपकी सारी शर्तें,
केवल दूसरों के बेस पर टिकी हैं.
वहां, आपके जीतने के चांस जीरो परसेंट ही रहेंगे.

टाइम-पास करने या
समय को रबड़ की तरह चबाते रहने के लिए,
शायद, ये तरीका काम कर जाए
लेकिन स्वयं को आनंदित रखने के लिए,
आपको, कभी ना कभी, 
ख़ुद पर ही काम करना पड़ेगा.
दूसरों का सामान बेचकर, 
आप, ख़ुद को, खोते रहेंगे,
और एक दिन बिना ख़ुद से मिले, बीत लेंगे.
ये रिस्क, बड़ा है.

समझदारी, इसी में है कि छोटे रिस्क लिए जायें,
ऐसी शर्तें हों, जो काम कर सकें.
और, इन सब के लिए,
आपको, ख़ुद को आजमाना होगा
क्योंकि, दूसरों को आजमाने के तरीके और शर्तें,
किसी मौसम में भी खुशियों की बारिश नहीं करेंगे.

अभी, मौसम साफ़ है.
ये अपने पर, कुछ लागू करने का समय है.
अगर आप, 
हर शर्त का, अच्छा ही रिजल्ट चाहते हैं,
तो सबसे पहले, अपनी शर्त लगाइए.

ख़ुद की नज़रों में, ख़ुद को साबित कीजिए
और आपके पास, हारने के तरीकों से ज्यादा,
जीतने की रेसिपी बुक, थोड़ी बड़ी बन जायेगी.

और ये सब, बिना कुछ थोपे होगा,
जो आपको मुस्कुराने और 
आभारी होने पर मजबूर करता रहेगा,
मजबूत करता रहेगा.


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Mar 14, 2020

नमस्ते वाले वायरस, आपको जीना सीखा सकते हैं.





उम्र बढ़ने के साथ इन्क्लुसिवनेस बढ़नी चाहिए,
जीवन के साथ और दूसरे सभी जीवों के साथ.

मगर हम कर बैठते हैं रेसिप्रोकल थेरेपी.
तर्क के गणित में ख़ुद को उलझाने में 
तसल्ली की आदत को
गोल्ड मैडल समझ कर चूमते रहते हैं 
घंटो-घंटो तक
और दिन बीत जाता है.

फ़िर
होता कुछ नहीं,
मिलता कुछ नहीं,
सूझता कुछ नहीं
और लगता है जैसे क़िस्मत 
क्लिक ही नहीं कर रही.

और कुछ दिनों बाद ठंडे पड़ जाते हैं,
अनुभव, रिश्ते, ज़ोश और उम्मीदें.
सिरे चढ़ जाती है,
अकड़, उदासी, शक और डर की बेड़ियां.

भ्रम और संघर्ष का डिफरेंस महीन होता है.
भ्रम पालना आसान है, 
कम्फ़र्टेबल भी और एक्सेप्ट करना भी.
संघर्ष घिसाता है, पीटता है, 
लेकिन एक दिन चमका भी देता है.

तो जब भी कोई भ्रम, 
आपको भस्म करने की कोशिश करे,
उसे मसल कर पिस दीजिए, 
जैसे मिक्सी में धनिया.
पूरा ग्राइंड कर दीजिए.
अपने तर्कों को अदरक की तरह कूट डालिए.

इसमें संघर्ष लगेगा,
क्योंकि आप अपनी एक बकवास 
सी आदत की मोटाई को,
पिस-पिस कर, घिस-घिस कर बारीक बना रहे हैं
लेकिन कुछ समय बाद, ये निश्चित रूप से,
आपके लिए सुकून के लम्हें 
ज़रूर उपलब्ध करा देगा.

तो लंबे समय से, 
अपने माइंड को दी गई बकवास से ऊबकर
जिंदगी को बोरिंग बनाने का नहीं,
बल्कि छोटे समय में, 
अपने माइंड को दी गई उपजाऊ खाद से
अपने विचारों की फ़सल को 
लहलहाने का मौका दीजिए.

फ़िर देखिए कि जीवन का रंग, 
सुनहरी बन कर कैसे निखरता है.
तब तक डर का मज़ा लेते रहिए.

करोना से ये सीखा जा सकता है.
क्योंकि, कोई वायरस बनाते समय, 
आदमी को शायद ही कभी
ये लगता है के वो, 
उसे कभी चोट पहुंचा सकता है?
रिमोट कंट्रोल तो उसके ही पास है.

लेकिन जैसे ही, वायरस की उम्र बढ़ती है,
वो अपने समझदारी के नतीजे, 
पूरी दुनिया के आगे प्रस्तुत कर देता है.

छोटा वायरस, आपसे डरता है
और जब वो बड़ा होकर,
अपने पैरों पर खड़ा हो जाता है
तब आपको, उससे डरना पड़ता है.
क्रेडिट, आपको ही जाता है
क्योंकि, इसको तराशने वाले पुरोधा, आप ही थे.

दुनिया चलती मगर, ऐसे ही है.
कोई भी सनक, 
ख़ुद को साइंटिफिक मानने में 
कहां गुरेज करती है?

हां लेकिन,
इससे परे,
आप, इतना तो कर ही सकते हैं
कि अपने माइंड को वायरस-फ्री थॉट्स देते रहें,
फ़िर चाहे, कहीं भी, कुछ भी होता रहे,
आपके इन्फेक्ट होने और 
डर को भ्रम बनाने के चांस, 
मिनिमम ही रह सकेंगे.

क्या ये वाकई, सुकून भरा सफ़र नहीं होगा फ़िर?
किसी एक पल के लिए ही सही.

वायरस, आते - जाते रहते हैं.
नमस्ते वाले वायरस, 
आपको, अकेले जीने की कला सिखाते हैं.
लेकिन 
आपकी जिंदगी, क्या सिर्फ़ उनसे डरने के लिए है?
ये आपको सोचना है, वायरस को नहीं.




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